For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Veena Sethi
  • Female
Share on Facebook MySpace

Veena Sethi's Friends

  • D P Mathur
  • POOJA AGARWAL
  • Vindu Babu
  • Tushar Raj Rastogi
  • aman kumar
  • अरुन 'अनन्त'
  • Bhajman Nanavaty
  • deepti sharma
  • SANDEEP KUMAR PATEL
  • Nilansh
  • Roshni Dhir
  • डॉ. सूर्या बाली "सूरज"
  • Bhawesh Rajpal
  • Saurabh Pandey
  • आशीष यादव
 

Veena Sethi's Page

Latest Activity

Veena Sethi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-62 (विषय: मर्यादा)
"मर्यादा -वह पन्नी बिननेवाली उसका का रोज का काम सुबह उठकर पोलिथिन की थैलिया और पन्नी बीनना था. वह सालो से यह काम कर रही थी, शायद ही कभी उसने सुबह उठकर कुल्ला या मंजन किया हो, उसे खुद भी याद नहीं होगा. वह सीधे किसी भी होटेल में जाती और वही चाय के घूँट…"
May 30, 2020

Profile Information

Gender
Female
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Bhopal
Profession
Creative Fashion Designer

Veena Sethi's Photos

  • Add Photos
  • View All

Veena Sethi's Blog

जीवन

जीवन

तुम हो 

 एक अबूझ पहेली,

न जाने फिर भी

क्यों लगता है

तुम्हे बूझ ही लूंगी.

पर जितना तुम्हें

हल करने की

कोशिश करती हूँ,

उतना ही तुम

उलझा देते हो.

थका देते हो.

पर मैंने भी ठाना है;

जितना तुम उलझाओगे ,

उतना तुम्हें

हल करने में;

मुझे आनन्द आएगा.

और

इसी तरह देखना;

एक दिन

तुम मेरे

हो जाओगे.…

Continue

Posted on December 18, 2017 at 8:30pm — 5 Comments

सम्मान की एक जिंदगी.लघु कथा

जब से पता चला है कि रत्ना एक समय धन्धा करती थी, तब से पूरे समूह की दूसरी औरतों के चेहरे पर उसके प्रति नपंसदगी और तनाव साफ देखा जा सकता है. पर किसी में हिम्मत नहीं थी कि उसका विरोध कर सके क्योंकि सबको दीदी का डर सता रहा था. मै ये बात एक स्वयं सहायता समूह “उदया” की कर रही हूँ जो हस्तशिल्प का काम एक एन.जी.ओ. के लिए करता है, जिसे विभा दीदी संचालित करती हैं. समूह की अध्यक्षा सरला से जब रहा नहीं गया तो उसने सबसे सलाह कर दीदी से बात करने की ठानी.

आज जब विभा आई तो उसने सबके बीच पसरे…

Continue

Posted on June 6, 2015 at 2:00pm — 7 Comments

धूप -कविता

धूप 



 

जिधर देखो आज

धुन्धलाइ सी है धूप. 

 

न जाने आज क्यों?

कुम्हलाई सी है धूप. 

 

आसमाँ के बादलों से

भरमाई सी है धूप. 

 

पखेरूओं की चहचाहट से

क्यों बौराई सी है धूप? 

 

पेड़ों की छाँव तले

क्यों अलसाई सी है धूप? 

चैत के माह में भी

बेहद तमतामाई सी है धूप. 

 

हवाओं की कश्ती पर सवार

क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?

"मौलिक व…

Continue

Posted on July 24, 2014 at 5:30pm — 8 Comments

आत्म विश्लेषण क्यों न करे एक बार..........

कहते हैं की इन्सान दुनिया से मुँह चुरा सकता है पर स्वयं से नहीं। जब भी हम कुछ करते हैं अच्छा या बुरा हम स्वयं ही उसके गवाह और न्यायाधीश होते हैं, अगर अच्छा करते हैं तो खुद को शाबासी देते हैं और बुरा करते हैं तो स्वयं को कटघरे में खड़ा कर देते हैं,क्योंकि हम खुद के प्रति उत्तरदायी होते हैं पर ये सारी क्रिया हम दुनिया के सामने करने का साहस  कर सकते हैं … ??? नहीं … ना …!! क्योंकि हम दुनिया से मुँह चुरा रहे होते हैं। हमारे  कार्य जीवन के प्रति हमारे नजरिये से जुड़े होते हैं। हम क्या अच्छा करते…

Continue

Posted on December 27, 2013 at 5:30pm — 4 Comments

Comment Wall (6 comments)

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

At 8:37am on February 24, 2014, Vindu Babu said…

At 8:37am on February 24, 2014, Vindu Babu said…

आपका हार्दिक स्वागत करती हूँ आदरणीया वीणा जी।
सादर

At 4:39pm on July 9, 2012, अरुन 'अनन्त' said…

आपका तहे दिल से स्वागत है वीना जी.

At 8:15pm on May 14, 2012, SANDEEP KUMAR PATEL said…

आपका स्वागत है .............वीणा जी ..............आभारी हुँ

At 8:20am on May 13, 2012, Bhawesh Rajpal said…

Respected Veena ji , I am pleased to accept your offer of friendship , and greatful to you.

Thaks and Regards .

    -  Bhawesh Rajpal.(rajpal.bhawesh@yahoo.com )

At 8:13pm on May 11, 2012, Bhawesh Rajpal said…
वीणा सेठी जी आपका हार्दिक स्वागत  ! 
 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
7 hours ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
7 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
9 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
13 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
13 hours ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
13 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
14 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service