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कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे (ग़ज़ल 'राज')

२२   २२  २२  २२  २२  २२  २२  २२  

अवशेष चिनारों के तुमसे आफ़ात पुरानी  कह देंगे

हालात वहाँ कैसे बिगड़े खुद अपनी जुबानी कह देंगे

 

 दीवारें धज्जी धज्जी सी हर छत दिखती उधड़ी उधड़ी                     

 आसार लहू के अक्स तुम्हें बेख़ौफ़ कहानी कह देंगे

 

दिखते पर्वत सहमे-सहमे औ गुम-सुम से झरने नदियाँ   

कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे  

 

जो साथ जला करते थे कभी आबाद रहे जिनसे आँगन

वो आज अल्हेदा चूल्हे खुद दिल की वीरानी कह देंगे

 

चुपचाप सुलगते शोलों में इतिहास झुलसते देखा है 

तुम राख़ कुरेदोगे जितनी वो पीर रूहानी कह देंगे

 

सब  डाल यहाँ सूखी-सूखी हर फूल पे छाई  मुर्दाई   

मौसम ने कितने जख्म दिए सब उसकी निशानी कह देंगे

 

उम्मीद पे जीना कायम है उम्मीद नहीं तो क्या जीना

जो वक़्त पकड़ कर साथ चले उसे उम्रे रवानी कह देंगे

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 16, 2014 at 11:31am

आपने सही समझा मिथिलेश जी ,ये ग़ज़ल सच में मैंने उन्ही वादियों में बैठ कर लिखी थी कई बार जाना हुआ कश्मीर में हर बार वहां की वादियों के जख्म कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित करते रहे कारगिल की सड़कों पर घूमी वहां के ध्वस्त हुए छोटे छोटे घर सेना के बनकर आज भी मिल जायेंगे बस उसी रौ में बहाकर ये ग़ज़ल लिखी ,आपको प्रभावित कर सकी मेरा लिखना सार्थक हुआ ,तहे दिल से आभार आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 16, 2014 at 12:23am

कश्मीर की वादियों में जैसे ये ग़ज़ल गूँज रही है ...  हमसे तुमसे ये कितना कुछ पूछ रही है 

बहुत ही संजीदा और बेहतरीन ग़ज़ल ..... नमन आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 4, 2014 at 10:08am

आ० सौरभ जी,ग़ज़ल आपकी दाद पाकर धन्य हुई ,तहे दिल से आभारी हूँ सादर.  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 1:23am

ग़ज़ल के लिए दाद कुबूल करें, आदरणीया राजेश कुमारीजी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2014 at 10:19pm

आ० संतलाल करुण जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई ,आपकी प्रतिक्रिया से मेरी कलम को संबल मिला ,मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभारी हूँ सादर. 

Comment by Santlal Karun on August 1, 2014 at 9:58pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी,

सभी शेर नायाब हैं --

"उम्मीद पे जीना कायम है उम्मीद नहीं तो क्या जीना

जो वक़्त पकड़ कर साथ चले उसे उम्रे रवानी कह देंगे"

... इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2014 at 5:04pm

नरेन्द्र सिंह चौहान जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका तहे दिल से आभार मेरा लिखना सार्थक हुआ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 31, 2014 at 7:20pm

आ० मदन मोहन सक्सेना जी,आपको ग़ज़ल के अशआर प्रभावित किये मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार आपका . 

Comment by Madan Mohan saxena on July 31, 2014 at 12:29pm

दिखते पर्वत सहमे-सहमे औ गुम-सुम से झरने नदियाँ
कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे

जो साथ जला करते थे कभी आबाद रहे जिनसे आँगन
वो आज अल्हेदा चूल्हे खुद दिल की वीरानी कह देंगे

बधाई आपको,बहुत खुबसूरत गजल


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 31, 2014 at 8:59am

आ०  विजय निकोर जी,ग़ज़ल आपको पसंद आई मेरी मेहनत सफल हुई हार्दिक आभार आपका सादर  

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