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कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे (ग़ज़ल 'राज')

२२   २२  २२  २२  २२  २२  २२  २२  

अवशेष चिनारों के तुमसे आफ़ात पुरानी  कह देंगे

हालात वहाँ कैसे बिगड़े खुद अपनी जुबानी कह देंगे

 

 दीवारें धज्जी धज्जी सी हर छत दिखती उधड़ी उधड़ी                     

 आसार लहू के अक्स तुम्हें बेख़ौफ़ कहानी कह देंगे

 

दिखते पर्वत सहमे-सहमे औ गुम-सुम से झरने नदियाँ   

कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे  

 

जो साथ जला करते थे कभी आबाद रहे जिनसे आँगन

वो आज अल्हेदा चूल्हे खुद दिल की वीरानी कह देंगे

 

चुपचाप सुलगते शोलों में इतिहास झुलसते देखा है 

तुम राख़ कुरेदोगे जितनी वो पीर रूहानी कह देंगे

 

सब  डाल यहाँ सूखी-सूखी हर फूल पे छाई  मुर्दाई   

मौसम ने कितने जख्म दिए सब उसकी निशानी कह देंगे

 

उम्मीद पे जीना कायम है उम्मीद नहीं तो क्या जीना

जो वक़्त पकड़ कर साथ चले उसे उम्रे रवानी कह देंगे

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by vijay nikore on July 31, 2014 at 5:17am

बहुत ही सुन्दर गज़ल। पढ़ कर आनन्द आया। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2014 at 6:28pm

आ० गुमनाम पिथौरागढ़ी जी ,ग़ज़ल पर आपकी सराहना पाकर प्रसन्न हूँ ,दिली आभार आपका |

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 30, 2014 at 5:40pm

चुपचाप सुलगते शोलों में इतिहास झुलसते देखा है
तुम राख़ कुरेदोगे जितनी वो पीर रूहानी कह देंगे

! क्या बात है  बधाइयाँ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2014 at 4:16pm

आ० डॉ गोपाल नारायण जी,आपकी इस उत्साह वर्धन करती हुई प्रतिक्रिया की बेहद शुक्रगुजार हूँ मेरा लिखना सार्थक हुआ |सादर  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2014 at 4:14pm

आ० गिरिराज जी,ग़ज़ल आपको अच्छी लगी तहे दिल से आभार आपका | 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 30, 2014 at 1:49pm

आह--------

महनीया , इतनी सुन्दर गजल  i किस किस शेर की तारीफ कर्रूँ i  मै निःशब्द हूँ i  सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 30, 2014 at 1:36pm

आदरणीया राजेश जी , बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है , सभी आशआर  अच्छे लगे | पूरी ग़ज़ल के लिए आपको बधाइयाँ ||


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2014 at 9:50am

आ० डॉ विजय शंकर जी,आपको ग़ज़ल उसके भाव प्रभावित कर सके तहे दिल से आभारी हूँ ,मेरा लिखना सार्थक हुआ सादर . 

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 30, 2014 at 9:28am
चुपचाप सुलगते शोलों में इतिहास झुलसते देखा है
तुम राख़ कुरेदोगे जितनी वो पीर रूहानी कह देंगे
कोई लाख छुपाये कहानियां हर गम और दर्द अपना
जीवन बहता पानी ,आंसू अपनी जुबानी कह देंगें
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , प्रशस्ति में मेरी दो लाइने , सादर आदरणीय राजेश कुमारी जी .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 29, 2014 at 11:26pm

जितेन्द्र भैया ,ग़ज़ल पर सर्वप्रथम प्रतिक्रिया और होंसलाफ्जाई का हार्दिक आभार |

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