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चार ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)

(चार ग़ज़लें)

1

रास्तों को देखिए कुछ हो गया है आजकल

इस शहर में आदमी फिर खो गया है आजकल

 

काँपते मौसम को किसने छू लिया है प्यार से

इस हवा का मन समंदर हो गया है आजकल

 

अजनबी-सी आहटें सुनने लगे हैं लोग सब

मन में सपने आके कोई बो गया है आजकल

 

मुद्दतों तक आईने के सामने था जो खड़ा

वो आदमी अब ढूँढने खुद को गया है आजकल

 

आदमी जो था धड़कता पर्वतों के दिल में अब

झील के मन में सिमटकर सो गया है आजकल

 

2

दूर तक फैला हुआ संसार है

ये मेरे अंतर का ही विस्तार है

 

तुम तलक पहुँचूं तो पहुँचूं किस तरह

क़ैद में हूं हर तरफ दीवार है

 

नाम पर जिसके ये ख़त है रात भर

खांसता है, आजकल बीमार है

 

अब हो ऐसा कुछ पुकारो तुम मुझे

मैं कहूँ, हाँ, हर कोई तैयार है

 

ख़्वाब सब सच हों तुम्हारे, इसलिए

जंग में हूँ, हाथ में तलवार है

 

आज तक जो भी लिखा ‘राकेश’ ने

गीत सारे, हर ग़ज़ल बेकार है

 

3

मेरे दर्द को पहचान ले

फिर मस्जिदों से अजान दे

 

ये भूख से मर जाएगा

इसे मौत कोई आसान दे

 

मुझे गाँव याद है आ गया

मुझे गाँव का वो मचान दे

 

हर आदमी चालाक है

इक आदमी नादान दे

 

संसार की तू फ़िक्र कर

मेरी तरफ भी ध्यान दे

 

इन जंगलों में मौत है

तू आदमी को मकान दे

 

4

अजनबी जब से ज़माना हो गया है

आदमी थोड़ा सयाना हो गया है

 

बात जबसे हक़ की है करने लगा

आप कहते हैं दीवाना हो गया है

 

ज़िक्र फिर से आंसुओं का हम करें

छोड़िए गाना-बजाना हो गया है

 

आप दर्पण पर न यूं चिल्लाइए

आपका चेहरा पुराना हो गया है

 

महफ़िलों में आपके चर्चे हुए

यूं न आना भी तो आना हो गया है

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

(डॉ. राकेश जोशी)

 

Views: 1840

Comment

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Comment by Dr. Rakesh Joshi on August 28, 2014 at 11:22pm

आदरणीय सविता जी,
आपको मेरी ग़ज़लें पसंद आईं. मैं इसके लिए आपका आभारी हूँ.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी

Comment by Dr. Rakesh Joshi on August 28, 2014 at 11:19pm

Comment by Dr. Rakesh Joshi on August 28, 2014 at 11:19pm

आदरणीय पवन जी,
आपको मेरी ग़ज़लें पसंद आईं. आपको धन्यवाद.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी

Comment by Dr. Rakesh Joshi on August 28, 2014 at 11:17pm

Comment by Dr. Rakesh Joshi on August 28, 2014 at 11:17pm

आदरणीय भुवन जी,
आपको मेरी ग़ज़लें पसंद आईं. आपको धन्यवाद.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी

Comment by Ajay Agyat on August 24, 2014 at 9:20am

अच्छा प्रयास॥ सराहनीय 

Comment by कल्पना रामानी on August 23, 2014 at 9:09pm

सुंदर और सार्थक गज़लों के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ

Comment by Pawan Kumar on August 22, 2014 at 2:32pm

सभी की सभी गजलें बेहतरीन हैं, बहुत ही अच्छा लगा .... ढेर सारी शुभकामनायें

Comment by भुवन निस्तेज on August 21, 2014 at 5:55pm

ये भूख से मर जाएगा

इसे मौत कोई आसान दे

*************************

ज़िक्र फिर से आंसुओं का हम करें

छोड़िए गाना-बजाना हो गया है

 *****************************************

ख़्वाब सब सच हों तुम्हारे, इसलिए

जंग में हूँ, हाथ में तलवार है

*************************************

आपकी गजलें खूब पसंद आई, आपकी लेखनी को शत शत नमन, कृपया आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी कि बातों पर गौर फरमायेंगे तो सभी लाभांवित हों....

Comment by savitamishra on August 20, 2014 at 7:51pm

ये भूख से मर जाएगा

इसे मौत कोई आसान दे.........बहुत खुबसुरत सभी

कृपया ध्यान दे...

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