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गजल - शशि पुरवार

२१२२ २१२२ २१२
जंग दौलत की छिड़ी है रार क्या
आदमी की आज है दरकार क्या १

जालसाजी के घनेरे मेघ है
हो गया जीवन सभी बेकार क्या२


लुट रही है राह में हर नार क्यों
झुक रहा है शर्म से संसार क्या ३

छल रहे है दोस्ती की आड़ में
अब भरोसे का नहीं किरदार क्या ४

गुम हुआ साया भी अपना छोड़कर
हो रहा जीना भी अब दुश्वार क्या ५


धुंध आँखों से छटी जब प्रेम की
घात अपनों का दिखा गद्दार क्या६

इन निगाहों में खलिस थी पल रही
आइना भी खोलता है सार क्या ७


खिड़कियाँ तो बंद हिय की खोलिए
माफ़ अपनों को करो ,तकरार क्या८


धड़कने क्यों हो रही है अजनबी
रंग जीवन के सभी उपहार क्या ९


बाँट लो खुशियाँ सभी जीवन है कम
ख्वाब अँखियों के करे साकार क्या १०

"शशि " कहे तुम रंज अपने भूलकर
बढ़ चलो राहों में अपनी ,वार क्या ११

----------- शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by shashi purwar on August 24, 2014 at 6:37pm

आप सभी माननीय सुधिजनो का हृदय तल  से आभार ,  आप सभी की अनमोल  टिप्पणी ने  रचना को गौरान्वित किया और हमें बहुत उर्ज्वासित किया

Comment by Meena Pathak on August 23, 2014 at 1:59pm

लाजवाब गज़ल हेतु बहुत बहुत बधाई आप को

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 22, 2014 at 2:42pm

आदरणीया शशि जी ..इस सुंदर ग़ज़ल के हार्दिक बधाई ..सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 22, 2014 at 1:28pm

आदरणीया शशिजी, ग़ज़ल विधा पर आपका प्रयास अच्छा लगा.

यों इस ग़ज़ल के कुछ शेरों के कथ्यों में तार्किकता आवश्यक है. 

बहरहाल, आपके इस गंभीर प्रयास के लिए बधाई .....

Comment by विजय मिश्र on August 21, 2014 at 12:57pm
वर्तमान की गंदगियों को अच्छे शब्दों से नवाजा है ,रचना अपने उदेश्य में सफल हो , समाज से कलुषता समाप्त हो | ईश्वर से प्रार्थना है |

बाँट लो खुशियाँ सभी जीवन है कम
ख्वाब अँखियों के करे साकार क्या |- बहुत प्रभावित किया |साधुवाद शशिजी
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 20, 2014 at 1:55pm

शशि जी

बहुत लाजवाब गजल i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2014 at 9:49am

लुट रही है राह में हर नार क्यों
झुक रहा है शर्म से संसार क्या 

गुम हुआ साया भी अपना छोड़कर
हो रहा जीना भी अब दुश्वार क्या  -----आदरणीया शशि जी , बहुत सुन्दर ग़ज़ल और इन अश 'आर के लिए बधाइयाँ |

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 19, 2014 at 9:15pm

आदरणीया शशि पुरवार जी, सदर अभिवादन!

मेरे हिशाब से प्रासंगिक पंक्तियाँ- 

लुट रही है राह में हर नार क्यों
झुक रहा है शर्म से संसार क्या ३ साधुवाद!

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