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कि तेरी याद आती है

चले आओ कभी आगोश में,
सब छोड़ के जालिम!
ये रातें कट रही तन्हा,
कि तेरी याद आती है।

बताऊँ फिर तुझे कैसे,
दिल-ए-नादाँ की बातें!
मैं खुद में हो गया आधा,
कि तेरी याद आती है।

कभी रहती थी पलकों पे,
हुस्न-ए-नूर बनकर तुम!
वही बनके तूँ फिर आजा,
कि तेरी याद आती है।

समय बदला, फिजा बदली,
अभी ये दिल नही बदला!
समय के साथ तूँ बदली,
कि तेरी याद आती है।

सोचता हूँ समेटूँगा,
तेरी यादों के लम्हों को!
मगर फुर्सत नही मिलती,
कि तेरी याद आती है।

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Views: 689

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Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 1:00pm

""आदरणीय  गिरिराज भंडारी  जी, सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! ""

Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 12:59pm

आदरणीया महिमा  जी  सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! "


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2014 at 8:27pm

आदरणीय , सुन्दर गीत , बधाई |

Comment by MAHIMA SHREE on August 25, 2014 at 5:36pm

खुबसूरत रोमानियत से सराबोर गीत के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Pawan Kumar on August 25, 2014 at 2:19pm

आदरणीया सविता  जी  सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! ""

Comment by Pawan Kumar on August 25, 2014 at 2:18pm

"आदरणीया राजेश कुमारी जी  सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! """

Comment by Pawan Kumar on August 25, 2014 at 1:48pm

आदरणीया मीना पाठक जी  सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! ""

Comment by savitamishra on August 24, 2014 at 10:44pm

बहुत सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 23, 2014 at 6:55pm

बहुत सुन्दर... भावपूर्ण मासूम प्रस्तुति हार्दिक बधाई आपको 

Comment by Meena Pathak on August 23, 2014 at 1:48pm

बहुत सुन्दर ..हार्दिक बधाई 

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