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ग़ज़ल ..तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया

गागा लगा लगा /लल /गागा लगा लगा 

तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया,
चलने से राह-ए-कुफ़्र पे इनकार कर दिया.
.

मै ज़ीस्त के सफर में गलत मोड़ जब मुड़ा,
मेरी ख़ुदी ने मुझको ख़बरदार कर दिया.
.

इज़हार-ए-इश्क़ में वो नज़ाकत नहीं रही,                      
क्या दिल की धडकनों को भी अखबार कर दिया??
.
हम आदमी थे काम के ग़ालिब तेरी तरह,   
लेकिन हमें भी इश्क़ ने बेकार कर दिया.
.
सुन ऐ हकीम अब तू दवा मैक़दे की दे, 
तेरी दवाइयों ने तो बीमार कर दिया.
.

फिर आज उनकी तल्ख़ बयानी हुई है तेज़,
फिर आज मैंने मिलने से इनकार कर दिया.
.
बरसा ख़ुदा का
नूर तो रौशन हुई ग़ज़ल,
जुगनू बना के मुझ को चमकदार कर दिया. 
.
निलेश "नूर"

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 29, 2014 at 8:27am

धन्यवाद आ. महिमा श्री साहिबा 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 29, 2014 at 8:27am

धन्यवाद डॉ. आशुतोष मिश्रा साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 29, 2014 at 8:26am

धन्यवाद भाई जीतेंद्र गीत जी 

Comment by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 9:16pm

वाह शानदार ग़ज़ल .. हार्दिक बधाई ..आपको सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 27, 2014 at 11:07am
आदरणीय नूर जी ..आपकी ग़ज़लें उम्दा होने के साथ कुछ न कुछ सीखने का भी मौका देती हैं हर शेर बेहतरीन किसी बिशेष की बात करना बेमानी होगी ..इस शानदार रचना पर आपको हार्दिक बधाई सादर
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 27, 2014 at 10:16am

वाह! आदरणीय निलेश भाईसाहब, बेमिशाल शे'र कहे आपने. बहुत-२ बधाई आपको

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 26, 2014 at 9:40pm

शुक्रिया आ. भुवन जी 

Comment by भुवन निस्तेज on August 26, 2014 at 5:56pm

किसी शेर क कोइ सानी नही नूर साहब, बधाई हो....

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 26, 2014 at 5:43pm

धन्यवाद आ. डॉ गोपाल नारायण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 26, 2014 at 5:42pm

धन्यवाद आ. राजेश कुमारी जी ...

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