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सच कहता हूँ यारो मै - ( गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2222    2222    2222    222
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रिश्ते उधड़े खुद ही सिलना सच कहता हूँ यारो मैं
औरों  को  मत रोते दिखना सच कहता हूँ यारो मैं
***
अपना  हो  या  बेगाना  हो  सुख  में  ही अपना होता
जब भी मिलना हॅसके मिलना सच कहता हूँ यारो मैं
***
चाहे भाये कुछ पल लेकिन आगे चलकर दुख देगा
उम्मीदों  से  जादा  मिलना सच कहता हूँ यारो मैं
***
दुख से सुख का सुख से दुख का मौसम जैसा नाता है
हर  मौसम  को  अपना  कहना सच कहता हूँ यारो मैं
***
दौलतदां हो इक सिक्के की कीमत को मत बिसराना
हर  सिक्के  को अपना रखना सच कहता हूँ यारो मैं
***
जब  मौसम  हो हरियाली का चाहे छुपना काटों सा
पतझड़ में फूलों सा खिलना सच कहता हूँ यारो मैं
***
मंदिर  में  चढ़ने  से  जादा  चाहे  जो चढ़ना शव पर
ऐसी कलियों पर मर मिटना सच कहता हूँ यारो मैं
***
( रचना 24 अगस्त 2014 )
****
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 793

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 7, 2014 at 10:29am

आदरणीय भांई गुमनाम जी गजल की प्रषंसा के लिए हार्दिक आभार 

Comment by gumnaam pithoragarhi on September 6, 2014 at 5:25pm

 बढ़िया ग़ज़ल कही है  बधाइयाँ,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:57am

आ०  महिमा जी , ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए बहुत बहुत आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:56am

आदरणीय भाई गिरिराज जी, गजल पर आपकी उपस्थिति से इसका मान बढ़ा है इसके लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:55am

आदरणीय भाई, आषुतोष जी गजल पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया और स्नहाशीष के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:55am

आदरणीय भाई गोपाल नाराणन जी , आपने अपनी प्रतिक्रिया से गजल की प्रशंसा करते हुए मुझे जो असीमित मान दिया है उसके लिए हार्दिक धन्यवाद । अभी मेरी लेखनी इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि आप जैसे विद्वजन मेरी ओर फरियादियों की तरह देखो । मुझ जैसे लेखकों को तो आप जैसे प्रबुद्धजनों का स्नेहभरा मार्गदर्शन चाहिए । जिससे बेहतर से बेहतर लिखकर साहित्यसेवा कर सकूं । स्नेह बनाए रखें यही कामना है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:55am


आदरणीय भाई विजय शंकर जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 6, 2014 at 10:54am

आदरणीय भाई नरेंद्रसिह जी, गजल का अनुमोदन कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by MAHIMA SHREE on September 5, 2014 at 5:11pm

रिश्ते उधड़े खुद ही सिलना सच कहता हूँ यारो मैं
औरों  को  मत रोते दिखना सच कहता हूँ यारो मैं.... शानदार...हर अशआर उम्दा है .. हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2014 at 5:26pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , बढ़िया ग़ज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ |

कृपया ध्यान दे...

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