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पानी को तलवार से काटते क्यों हो ? /नीरज नीर

पानी को तलवार से काटते क्यों हो ?

हिन्दी हैं हम सब, हमे बांटते क्यों हो ?

चरखे पे मजहब की पूनी चढ़ा कर के ,
सूत नफरत की यहाँ काटते क्यों हो ?

हो सभी को आईना फिरते दिखाते ,
आईने से खुद मगर भागते क्यों हो ?

गर करोगे प्यार , बदले  वही पाओगे,
वास्ता मजहब का दे, मांगते क्यों हो ?

भर लिया है खूब तुमने तिजोरी तो ,
चैन से सो, रातों को जागते क्यों हो ?

दाम कौड़ियों के हो बेचते सच को
रोच परचम झूठ का छापते क्यों हो ?

धर्म और ईमान के गर मुहाफ़िज़ हो
मज़लूमों को फिर भला मारते क्यों हो ?

नीरज कुमार नीर
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on September 7, 2014 at 5:45pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहब इस हौसला आफजाई के लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

Comment by annapurna bajpai on September 7, 2014 at 5:16pm

बहुत खूबसूरत गजल , हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 7, 2014 at 4:52pm

आदरणीय नीरज जी    लाजवााब गजल हार्दिक बधाइ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 7, 2014 at 4:11pm

चरखे पे मजहब की पूनी चढ़ा कर के ,
सूत नफरत की यहाँ काटते क्यों हो ..बहुत बढ़िया ...काटते   को कातते कर लीजिये .टाइपिंग एरर है इस सुंदर रचना के लिए तहे दिल बधाई आदरणीय नीरज जी                                                                                                                                     

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 7, 2014 at 1:39pm

बहुत ही सुन्दर , आदरणीय नीरज कुमार जी , बधाई। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 7, 2014 at 12:37pm

नीरज जी

बड़ी ही सुन्दर गजल हुयी है

हर शेर  बावज्न  है i

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