For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

इश्क कोई अनबुझी सी है पहेली

२१२२   २१२२   २१२२ 

ख्वाब जब दिल में हसीं पलने लगे है

अजनबी दो साथ में चलने लगे हैं 

इश्क कोई अनबुझी सी है पहेली 

जब हुआ सावन में तन जलने लगे हैं 

वक़्त के अंदाज बदले यूं समझ लो 

हुश्न आते पल्लू भी ढलने लगे हैं 

आप के शानो पे सर रखते कसम से 

लम्हे मेरी मौत के टलने लगे हैं 

जिस घड़ी ओंठो को गुल के चूम बैठा 

उस घड़ी से भौरों को खलने लगे हैं 

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 822

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by शकील समर on September 12, 2014 at 9:11am

आपका संशोधन दुरुस्त है आरदरणीय।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:53pm

गुदगुदाती हुई रचना! बधाई!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 10, 2014 at 8:00pm
आकर्षक, डॉo आशुतोष मिश्रा जी , बधाई.
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 10, 2014 at 11:12am

आदरणीय गिरिराज भाई साब शकील जी की बातों पर ध्यान दे ते हुए कुछ संसोधन कर रहा हूँ ...फिर भी कोई गलती है तो बताने का कष्ट करें सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 10, 2014 at 11:11am

आदरणीय शकील जी ..इता दोष के मामले में अक्सर गलती होती है ...कुछ शेर हटा कर सुधार करने की कोशिस कर रहा हूँ यदि फिर भी कोए गलती हो तो बताने का कष्ट करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2014 at 9:12pm

आदरणीय आशुतोष भाई , आ. शकील भाई की बात सही है , काफिया दोष पूर्ण है सुधार लीजिएगा | ग़ज़ल के प्रयास के लिए दिली बधाइयाँ |

Comment by शकील समर on September 9, 2014 at 4:51pm

आदरणीय डाक्टर साहब,
आपने मतले में रहने और डरने को काफिया चुना है। ये शब्द समतुकांत नहीं है, बल्कि समतुकांत होने का भ्रम पैदा कर रहे हैं। काफिया होने की एक शर्त ये भी है कि उसका हर्फे रवी समान हो। परंतु यहां ऐसा नहीं है। मूल शब्द 'डर' और 'रह' समतुकांत नहीं है। इस ईता का दोष कहते हैं। चूंकि मतले का काफिया ही दोषपूर्ण है, इसलिए आपको अपनी गजल पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।
हालांकि हुस्ने मतला में आपने काफिया सही चुना है, लेकिन शेष अशआर के काफिए दोषपूर्ण हैं।
सादर।

Comment by कल्पना रामानी on September 8, 2014 at 9:18pm

बहुत सुंदर गजल! बधाई आपको

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 8, 2014 at 1:35pm

आशू जी

 मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई -

प्रेम है कोई  पहेली  या समस्या i  

और जीवन भी भागीरथ की तपस्या 

स्नेह से सिचित अवनि आकाश साथी

नहीं आता प्यार सबको रास साथी i  

Comment by ram shiromani pathak on September 8, 2014 at 10:45am
वाह वाह आदरणीय आशुतोष जी बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल ।कुछ शेर तो बहुत ही बेहतरीन हुए है। हअदिक् बधाई आपको।।सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Friday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Friday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service