सर दाँव पे लगा के अब खेल खेल देखें ।
अपना नसीब देखें, उनकी गुलेल देखें ।
शायद उठे भड़क ही कोई दबी चिंगारी
चल राख हौसलों की परतें उधेल देखें ।
चेहरे सफ़ेद सबको कमज़ोर कर रहे हैं
इन बूढ़े नायकों को पीछे धकेल देखें ।
उद्दंड अश्व खाईं की ओर जा रहे हैं
हाथों में अपने लेकर इनकी नकेल देखें ।।
क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।
मौलिक व अप्रकाशित
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//सर दाँव पे लगा के अब खेल खेल देखें ।
अपना नसीब देखें, उनकी गुलेल देखें ।// क्या गज़ब का मतला है "खेल-खेल" यहाँ कमल कर रहा है।
//शायद उठे भड़क ही कोई दबी चिंगारी
चल राख हौसलों की परतें उधेल देखें ।// बहुत ही आला और आशावादी ख्याल।
//चेहरे सफ़ेद सबको कमज़ोर कर रहे हैं
इन बूढ़े नायकों को पीछे धकेल देखें ।// क्या कहने हैं।
//उद्दंड अश्व खाईं की ओर जा रहे हैं
हाथों में अपने लेकर इनकी नकेल देखें ।।// बहुत प्रभावशाली शेअर हुआ है , एक सार्थक सन्देश देता हुआ - वाह वाह वाह !!
//क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।// भाव स्तुत्य हैं !! मगर अमरबेल (२१२१) न चाहते हुए भी बदमज़गी पैदा कर गई आ० सुलभ अग्निहोत्री जी.
बहुत-बहुत आभार भाई जवाहर लाल जी !
आदरणीय चन्द्रशेखर पाण्डेय जी !
आप हमेशा की तरह सही हैं। अमरबेल को मैंने गलत वजन में ही बांधा है - 2121
मित्र ! जो मैं कहना चाहता हूँ उसके लिए मेरे पास अमरबेल का स्थानापन्न कोई दूसरा शब्द नहीं है - अतः भाव को प्रधानता देते हुए यह किया गया है।
आदरणीय बढ़िया ग़ज़ल हुई है बधाई
क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।
दूसरे मिसरे मे //अमरबेल// को किस वज़न मे बांधा गया है समझ नहीं आया, कृपया प्रकाश डालें। सादर
क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।
अनूठा ...बढ़िया...
धन्यवाद गिरिराज भंडारी जी !
धन्यवाद निलेश जी !
बढ़िया ग़ज़ल कही है , बधाइयाँ | आ. सुलभ जी |
बहुत खूब वाह वाह
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव आपके अनुग्रह के लिए अभारी हूँ.
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