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पत्थरों को राह के हरदम खला है

२१२२         २१२२       २1२२  

जब भी सागर बनने इक दरिया चला है 

पत्थरों को राह के हरदम खला है 

जूझते दरिया पे जो कसते थे ताने 

आज जलवे देख हाथों को मला है 

यूं नहीं बढ़ता है कोई जिन्दगी में

बढ़ने वाला रात दिन हरदम चला  है

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है

दोस्तों जिस को गले हमने लगाया 

बस रहा अफ़सोस उसने ही छला है 

मौलिक व अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 15, 2014 at 7:14pm

आशुतोष जी

अच्छा प्रयास है i सुन्दर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 15, 2014 at 3:05pm
" दोस्तों जिस को गले हमने लगाया
बस रहा अफ़सोस उसने ही छला है "
अच्छा है , पूरी ग़ज़ल अच्छी है , कभी कभी सोंचता हूँ ,
पत्थर न होते तो आदमी पत्थर न होते
बहुत बहुत बधाई आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी
Comment by Shyam Narain Verma on September 15, 2014 at 1:21pm
" सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई   "

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2014 at 12:18pm

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है  -- बहुत खूब आदरणीय आशुतोष  , बढ़िया ग़ज़ल कही है , बधाइयाँ |

जूझते दरिया पे जो कसते थे ताने 

आज जलवे देख हाथों को मला है    -- इस शे र में वचन दोष है ,   जूझते दरिया पे जो कसता था ताने  , करना उचित होगा |

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