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प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर

सोचता था कि सितारों, पर ज़मीं को साफ़ करके,
और चंदा को टिकाकर, मैं गगन के आसरे से,
कुछ चमन खाली बनाऊं, प्रेम कि अभिव्यक्ति खातिर.

चाहता था खोद डालूं , वृक्ष के भूतल किनारे,
कर दूँ समतल इस धरा के, मस्त से परबत ये सारे,
सोख कर सारा समंदर, और नदियों की रवानी,
कुछ धरा खाली सजाऊं, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

किन्तु चंदा और तारे, वृक्ष औ पर्वत हमारे,
सारी नदियाँ सागर सारे, ये दिशायें ये किनारे,
घोल लेते हैं हमें, हैं प्रेम की अभिव्यक्ति सारे.

ये नहीं तो क्या गगन है, ये नहीं तो क्या चमन है,
प्रेम की तो ढाल हैं ये, प्रेम का इनसे सृजन है,
आओ इनको हम बचाएँ, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

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Comment by neeraj tripathi on March 5, 2011 at 11:41pm
राजेश जी, रश्मि जी और विवेक जी,
तहे दिल से शुक्रिया ..वास्तव में इस रचना का हकदार मैं नहीं वरन मेरी मित्र मंजीत हैं जिन्होंने अंग्रेजी में ये लिखा था...

I thought of brooming the stars,

Picking the Moon and letting it rest against the wall of the sky,

To make space for love.

Also, I wanted to rake the trees, level the mountains,

...Soak the oceans and mop the rivers,

To make space for love.

On second thoughts,

I let them be,

To camouflage

You and me.

मैंने तो महज़ उसे हिंदी रूप देने का प्रयत्न भर किया है.


Comment by विवेक मिश्र on March 5, 2011 at 11:25pm
सचमुच प्रकृति के कण-कण में प्रेम व्याप्त है. इस सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें.
Comment by rashmi prabha on March 5, 2011 at 4:04pm
bahut badhiyaa
Comment by राजेश शर्मा on March 4, 2011 at 5:33pm
बहुत खूब नीरज जी,वास्तव में सारी श्रष्टि ही प्रेम का प्रतीक है
अच्छी रचना, 

कृपया ध्यान दे...

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