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ग़ज़ल --आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन ( गिरिराज भंडारी )

आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन

****************************************

२१२२     २१२२     २१२२     २१२

आदमी  में   जानवर    भी    जी  रहा  है  फ़ित्रतन

आदमी   में  आदमी  को   देखना   है  इक  चलन 

साजिशें  रचतीं   रहीं हैं   चुपके   चुपके   बदलियाँ

सूर्य को ढकना कभी मुमकिन हुआ क्या दफअतन ?

 

पर   ज़रा तो   खोलने   का वक़्त  दे, ऐ  वक़्त  तू  

फिर   मेरी   परवाज़   होगी   और ये   नीला गगन

 

बाज,   चुहिया   खा   गया, चालाकियों से ,चाल से

ये भी हम क्या  कह सके हैं बाज को, है   बदचलन 

 

हो   कहीं   मंज़र   गलत   तो   चादरों को तान के

तू   मेरी   तारीफ़   में  लग, मैं तेरी , दोनों मगन

 

शह्र   में   खोजा   बहुत   वो घर जिसे मैं घर कहूँ

बेहिसी   छाई   हुई   केवल   मिले    कंक्रीट  वन     

 

सिर्फ    भाटों - चारणों    की   लाइने  हैं  हर तरफ़   

हर  कोई  है  कर  रहा   उगते हुओं का ही  स्तवन 

तू   ही   मेरे  हौसले   की लाज   रखना  ऐ  ख़ुदा

मैं   सवेरे   नाम   ले के   कर   रहा हूँ   आचमन

************************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

 

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Comment

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Comment by Alok Mittal on October 15, 2014 at 7:58am

वाह वाह बहुत सुंदर ग़ज़ल ...

 

बाज,   चुहिया   खा   गया, चालाकियों से ,चाल से

ये भी हम क्या  कह सके हैं बाज को, है   बदचलन.........बहुत खूब

तू   ही   मेरे  हौसले   की लाज   रखना  ऐ  ख़ुदा

मैं   सवेरे   नाम   ले के   कर   रहा हूँ   आचमन...लाजवाब

बहुत बेतरीन ग़ज़ल हुई है सर जी

Comment by MAHIMA SHREE on October 7, 2014 at 8:50pm

साजिशें  रचतीं   रहीं हैं   चुपके   चुपके   बदलियाँ

सूर्य को ढकना कभी मुमकिन हुआ क्या दफअतन... वाह एक से बढ़ कर एक शेर  है ..हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 27, 2014 at 10:37pm

आदरणीया छाया जी , हौसला अफजाई के लिए आपका बहुत आभार |

Comment by Chhaya Shukla on September 27, 2014 at 7:04pm

आदरणीय गिरिराज जी,

प्यारी सी इस गज़ल के लिए बधाई स्वीकारें 
खूब सरस बन पड़ी है |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 21, 2014 at 6:27pm

आदरणीय गणेश दत्त भाई , हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 21, 2014 at 6:26pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , सराहना के लिए हार्दिक आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 21, 2014 at 6:25pm

आदरणीय विजय शंकर भाई , आपका दिली शुक्रिया |

Comment by Ganesh Datta Pandey on September 19, 2014 at 7:17pm

वाह ....

Comment by vijay nikore on September 18, 2014 at 11:28am

यह गज़ल भी खूबसूरत बनी है, भाई गिरिराज जी। बधाई।

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 18, 2014 at 9:39am
खूबसूरत , बधाई आ o गिरिराज भंडारी जी ,

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