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सपनों का सच--डा० विजय शंकर

यूँ तो सपनों का सच से
कोई वास्ता नहीं होता है |
सच सामने से
ज्यों ज्यों गुजरने लगता है ,
सपनों से डर लगने लगता है ॥
सपने जब टूटने लगते हैं ,
सच से डर लगने लगता है ॥
फिर भी कोई सपने देखना
छोड़ नहीं पाता है ।
रोज सपनों के सच होने के
सपने सजाता है ॥
सपने एक आशा हैं ,
एक उम्मीद हैं ,
कुछ पाने की , कुछ होने की
किसी चिर प्रतीक्षित
अभिलाषा के पूरी होने की |
क्योंकि यही तो जीवन है ,
यही तो जीवन का सच है ||

मौलिक एवं अप्रकाशित.

Views: 453

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on September 23, 2014 at 7:20pm
बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी .
Comment by khursheed khairadi on September 23, 2014 at 10:36am

सपने एक आशा हैं ,
एक उम्मीद हैं ,
कुछ पाने की , कुछ होने की
किसी चिर प्रतीक्षित
अभिलाषा के पूरी होने की |

आदरणीय विजयशंकर जी बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ हुई हैं ,आस जगाती काव्य पंक्तियों का सादर अभिनन्दन ,हार्दिक बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 21, 2014 at 4:00pm
सपने भविष्य की सुखद कल्पना होते हैं , आपसे सहमत हूँ मैं , इसीलिये प्रेरित करते हैं।
बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय हरी वल्लभ शर्मा जी .
Comment by harivallabh sharma on September 21, 2014 at 1:54pm

बहुत सुन्दर रचना आदरणीय...सपने ही हैं जो इंसान को आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं..सफलताओं के सारे सोपान इन्हीं में बसे होते...सुन्दर भाव बधाई आपको.

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 20, 2014 at 10:28pm
आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी , इस छोटी सी कविता को मान देने के लिए आभार , बधाई के लिए सादर धन्यवाद .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 20, 2014 at 1:55pm

विजय सर !
बहुत सार्थक बात कही आपने खासकर-

सपने एक आशा हैं ,
एक उम्मीद हैं ,
कुछ पाने की , कुछ होने की
किसी चिर प्रतीक्षित
अभिलाषा के पूरी होने की

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 20, 2014 at 12:19pm
प्रिय जीतेन्द्र जी इन पंक्तियों के लिए आपने समय दिया , उन्हें स्वीकार किया , बहुत बहुत धन्यवाद .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 20, 2014 at 8:38am

यही जीवन है और यही तो जीवन का सच भी है. यही सार है और यही केंद्र बिंदु भी. बहुत अच्छी रचना प्रस्तुति आदरणीय डा. विजय जी, बहुत-२ बधाई आपको

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 19, 2014 at 12:31pm
रचना को स्वीकृति प्रदान करने लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी .
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 18, 2014 at 11:26pm

आ ० डॉ. विजय शंकर जी,
सपने सच हों न हों पर आशा का दीप जलाये रखते हैं.
इस रचना पर बधाई स्वीकारे.

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