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दियालिया उजास दे (नवगीत) // --सौरभ

आँक दूँ ललाट पर
मैं चुम्बनों के दीप, आ..
रात भर विभोर तू
दियालिया उजास दे..

संयमी बना रहा
ये मौन भी विचित्र है
शब्द-शब्द पी
करे निनाद-ब्रह्म का वरण..  
कोंपलों में बद्ध क्यों
सुगंध देह से उमग ?
आ, सहज उघार दूँ
मैं विन्दु-विन्दु
आवरण..

रात्रि की उठान, किन्तु

स्वप्न शांत-थिर रहें..
भंगिमा से
रोम-रोम
तोष का विभास दे ! 

रात भर विभोर तू
दियालिया उजास दे.. .

श्रम सधे,
समर्थ हो..
प्रयास की लहर-लहर..
अर्थ स्वेद-धार का
गहन मगर विकर्म-सा !
ज्योति-शृंखला बले
शिरा-शिरा
सिहर-सिहर..
कम्पनों से व्यक्त हो
प्रगाढ़ प्रेम
नर्म-सा !

लालिमा प्रभात की
वियोग की कथा रचे
किन्तु, ’मावसी निशा
सुहाग का
समास दे ! 

रात भर विभोर तू
दियालिया उजास दे.. .
*********************
--सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2023 at 12:22pm

आपका हार्दिक आभार आ० आदित्य कुमार जी. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2023 at 12:21pm

हार्दिक आभार, आ० अभिनव अरुण जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2023 at 12:21pm

आ० विजय निकोर सर, जैसा कि मैंने आ० विजय मिश्र जी से निवेदन किया, विलम्ब से ही सही, अपनी रचना पर आपको आभार देने के क्रम में पुनः आना रोमांचित कर रहा है. यह अवश्य ःऐ, कि नवगीत 2014 का ही है. 
उत्साहवर्द्धन हेतु आपका हार्दिक आभार.

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2023 at 12:19pm

आ० विजय मिश्रजी, विलम्ब से ही सही, अपनी रचना पर आपको आभार देने के क्रम में पुनः आना रोमांचित कर रहा है. 
उत्साहवर्द्धन हेतु आपका हार्दिक आभार. 

Comment by Aditya Kumar on October 22, 2014 at 8:01pm

पढ़ कर बहुत अच्छा लगा और मै तो क्या कहूँ।  सुबह दीपोत्सव कवि शिरोमणि अग्रज श्री सौरभ जी !

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2014 at 3:23pm

बहुत सुन्दर बहुत ही सुन्दर गीत रचना ..क्या खूब शब्द शिल्प भाव प्रवाह सब कुछ उत्कृष्ट !! नमन है ...सादर नमन है !!!

Comment by vijay nikore on October 8, 2014 at 1:12pm

आपकी रचनाधर्मिता अद्भुत है, यह एक निर्विवाद सत्य है।

नवगीत बहुत अच्छा लगा। कथ्य और शिल्प दोनों ही मोहक हैं। 

हार्दिक बधाई, आदरणीय सौरभ जी।

Comment by विजय मिश्र on October 8, 2014 at 10:44am
बिम्बों ने अनुपम छटा बिखेरी है -

"लालिमा प्रभात की
वियोग की कथा रचे
किन्तु, ’मावसी निशा
सुहाग का
समास दे ! "

अनूठा अंश है जो अमा निशा को भी सार्थक स्वरुप देता है | अनेक शुभकामनाएँ इस सरस गीत के लिए सौरभजी |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 1:39pm

आदरणीया छायाजी, आपको प्रस्तुत रचनाप्रयास सुगढ़ लगा, एक प्रयासकर्ता के तौर पर यह मेरे लिए भी आश्वस्तिकारी है. अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद, आदरणीया.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 1:37pm

आदरणीय सत्यनारायणजी, आपकी उपस्थिति की प्रतीक्षा थी. रचनाकर्म का अनुमोदन आश्वस्तिकारक लगा.
सादर धन्यवाद

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