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हमेशा दौड़ में पिछड़ा रहा हूँ

मगर चिन्तन में मैं कछुआ रहा हूँ

खिलौना मैं नहीं जो खेल लोगे

हूँ इंसा मैं  भी ये  समझा रहा हूँ

सितम ढाओं, गुमां कर लो जी भर के

ये मत कहना कि मैं पछता रहा हूँ

मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम

हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ

तेरी तस्वीर पलकों में सजा के

तेरी  यादों से दिल बहला रहा हूँ 

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by Rahul Dangi Panchal on November 4, 2014 at 12:05pm
वाह! अति सुन्दर
Comment by Alok Mittal on October 21, 2014 at 4:34pm

बेहतरीन ग़ज़ल आपकी ...हर शेर आपका सुंदर

Comment by vijay nikore on October 21, 2014 at 2:21am

//मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम

हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ

तेरी तस्वीर पलकों में सजा के

तेरी  यादों से दिल बहला रहा हूँ //...

गज़ल के लिए बधाई, यह दो शेर तो बहुत ही अच्छे लगे।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 20, 2014 at 10:30pm

बहुत बेहतरीन गजल, आदरणीया महिमा जी. सभी शेर बहुत अच्छे कहे आपने.

मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम

हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ..........वाह! बहुत खूब.  शेर पर, विशेष बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 20, 2014 at 1:41pm

महिमा श्री और मात्रिक या वर्णिक रचनाएँ ! यह होती है सतत गहन अभ्यास की परिणति !
महिमाजी को ग़ज़ल पर अभ्यास करते देखना, एक तरह से गर्व के भाव का कारण बन रहा है. जिस तरह से बहर, काफ़िया तथा रदीफ़ का निर्वहन हुआ है वह आश्वस्त भी कर रहा है कि यह प्रयास मात्र वायव्य झोंका नहीं है.

मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम
हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ
सही बात .. .
दिल से बधाई तथा शुभकामनाएँ.

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