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जिक्र तेरा भी करूँ,पर कौनसे हक़ से

लोग हैं सब पत्थरों के आजकल मैं भी
बार करते ख़न्जरों के आजकल मैं भी

लुट गयीं अब तो बहारें, सब शज़र सूखे
गीत लिखता बन्जरों के आजकल मैं भी

मुफलिसी देखी कभी फुटपाथ पर रोती 
लोग देखे बे-घरों के आजकल मैं भी

दर्द को गाते हुये देखा फकीरों को
हो गये जो दर-दरों के आजकल मैं भी

आसमाँ छूने चला हूँ जिद़ पुरानी है
उड़ रहा हूँ बिन परों के आजकल मैं भी
 
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित 


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Comment

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Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:39pm

तहेदिल से शुक्रिया डॉ गोपाल नारायन जी 

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:37pm

शुक्रिया श्याम नारायन जी 

Comment by Saarthi Baidyanath on October 30, 2014 at 9:06pm

आसमाँ छूने चला हूँ जिद़ पुरानी है
उड़ रहा हूँ बिन परों के आजकल मैं भी... क्या कहने ! वाह वाह 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 30, 2014 at 5:05pm

गजले  होती रहती है यूँ तो अकसर लेकिन

दाद  दे रहे हैं उन्हें लोग आजकल मैं भी  i

Comment by Shyam Narain Verma on October 30, 2014 at 10:30am

बहुत सुंदर गज़ल। बधाई।

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