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तन्हा प्याला .....

तन्हा प्याला  ....

रजकण हूँ मैं प्रणय पंथ का
स्वप्न लोक का बंजारा
हार के भी वो जीती मुझसे
मैं जीत के हरदम ही हारा
नयन सिंधु में छवि है उसकी
वो तृषित मन की मधुशाला
प्रणयपाश एकांत पलों का
मन में जीवित ज्यूँ हाला
गीत कंठ के सूने उस बिन
रैन चांदनी बनी ज्वाला
नयन देहरी पर सजूँ मैं उसकी
हृदय में है ये अभिलाषा
अपने रक्तभ अधरों की मधु बूँद से
जो भर दे मेरा तन्हा प्याला 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on November 7, 2014 at 6:52pm
आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी रचना पर आपकी आत्मीय प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 7, 2014 at 12:16pm
बच्चन जी की मधुशाला की याद कराती सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई श्री सुशिल सरना जी
Comment by Sushil Sarna on November 6, 2014 at 12:45pm

आदरणीय   Shyam Narain Verma     जी रचना के भावों पर आपकी स्नेह   का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 6, 2014 at 12:44pm

आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया  जी रचना के भावों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा  का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 6, 2014 at 12:43pm

आदरणीय   Er. Ganesh Jee "Bagi"   जी रचना के भावों पर आपकी आत्मीय स्वीकृति का हार्दिक आभार। 

Comment by Shyam Narain Verma on November 6, 2014 at 11:39am

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... सादर बधाई


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 6, 2014 at 10:41am

हार और जीत से परे एक अलौकिक दुनिया की शैर करा गयी यह कविता, आदरणीय सरना साहब, बहुत ही प्यारी रचना बन पड़ी है, बहुत बहुत बधाई इस कृति के लिए।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 6, 2014 at 8:30am

बहुत खूब, सर जी. बहुत ही सुंदर, हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2014 at 6:05pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव   जी रचना पर आपकी स्नेहिल   प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2014 at 6:04pm

आदरणीय योगराज प्रभाक   जी रचना पर आपकी ऊर्जावान  प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

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