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बालपन की मस्तियाँ ....(.नवगीत) सीमा हरि शर्मा

* बालपन की मस्तियाँ *

इंद्रधनुषी रंग उतरे
हैं फलक पर से जमीं
बालपन की मस्तियों में
रंग सारे चुन रहे।

मन लुभाती हैं सदा ही
तोतली सी बोलियाँ
बात बेमतलब भले पर
शब्द मिसरी गोलियाँ
फूल झरते ओंठ से सब
तोल मोलों से परे
बस करें अपने दिलों की
ना किसी की सुन रहे।...बालपन की मस्तियों में

सर्द शामें पैर नंगे
फर्श पर जब दौड़ते
घुमती पीछे तभी माँ
चप्पलों को हाथ ले
चूमती है गाल ढककर
माँ कभी आँचल तले
शीत गरमी हो भले बस
खेल की ही धुन रहे।....बालपन की मस्तियों में

जुगनुओं को कैद करना
छिप-छिपाकर हाथ में
छोड़ देना बंद करके
दीप सारे रात में
है सभी खुशियाँ जहाँ की
रौशनी नन्ही तले
चाह चंदा की नहीं ना
स्वपन सूरज बुन रहे।......बालपन की मस्तियों

सीमा हरि शर्मा 22.11.2014 (मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by seemahari sharma on November 22, 2014 at 7:58pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी ह्रदय से आभारी हूँ आपने रचना को पसंद किया लिखना सार्थक रहा आओक मार्गदर्शन मेरे लिए पथ प्रदर्शक है सादर
Comment by seemahari sharma on November 22, 2014 at 7:53pm
आदरणीय Somesh Kumar ji बहुत बहुत आभार आपकी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए।
Comment by seemahari sharma on November 22, 2014 at 7:48pm
आदरणीय Shyam Narain Verma ji बहुत बहुत आभार आपने गीत पसंद किया।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 22, 2014 at 1:50pm

सीमा जी

अतीव सुन्दर रचना i

Comment by somesh kumar on November 22, 2014 at 10:49am

मासूम बचपन की मस्तियों को वर्णित कर पुनः बचपन के स्मरण करा गई ये रचना |

काश!ये बचपन यूँ ही मस्तियाँ करता रहे |इस रचना के लिए खूब सारे जुगनू-चंदा स्वीकार करें 

Comment by Shyam Narain Verma on November 22, 2014 at 9:56am

बहुत सुन्दर मनमुग्ध करता गीत ...बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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