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ग़ज़ल-----मैं समन्दर को आँखों में भरके चला हूँ

212 212 212 2122
-------------------------------------------
मुद्दतों से पलक बन्द करके चला हूँ
मैं समन्दर को आँखों में भरके चला हूँ
....
जा बसा पत्थरों में हुआ वो भी पत्थर
मैं फकीरों के जैसे बे-घरके चला हूँ
....
कैसे कहदूँ मेरे यार को बेव़फा मैं
जिसकी तस्वीर को दिल में धरके चला हूँ
....
ले गया वो मेरी साँस भी साथ अपने
जिन्दगी भर बिना साँस मरके चला हूँ
....
ले न जाये छुड़ाके कहीं याद अपनी
इसलिये उम्र भर ही मैं ड़रके चला हूँ
....

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 714

Comment

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Comment by umesh katara on November 29, 2014 at 1:06pm

Rahul Dangi जी शुक्रिया

Comment by umesh katara on November 29, 2014 at 1:06pm

शुक्रिया आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 28, 2014 at 11:11pm

आदरणीय उमेश भाई ,बहुत अच्छी गज़ल कही है , बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on November 28, 2014 at 6:01pm
सुन्दर बधाई हो
Comment by umesh katara on November 28, 2014 at 9:12am

शुक्रिया योगराज प्रभाकर जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 12:18pm

बहुत खूब आ० उमेश कटारा जी इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें।   

Comment by umesh katara on November 27, 2014 at 8:53am

शुक्रिया ramshiromani pathak ji

Comment by umesh katara on November 27, 2014 at 8:52am

शुक्रिया laxman dhami ji

Comment by umesh katara on November 27, 2014 at 8:52am

शुक्रिया राजेश कुमारी जी

Comment by umesh katara on November 27, 2014 at 8:52am

शुक्रिया मीना पाठक जी

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