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तब तलक इस जहाँ में हवायें रहेंगी

212 212 212 2122

जब तलक इस जहाँ में हवायें रहेंगी
तेरे चेहरे पे मेरी निगाहें रहेंगी

कोई पागल कहे या कहे फिर दिवाना
बस तेरे वास्ते ही व़फायें रहेंगी

चाहता ही नहीं मैं तुझे भूलजाना 
मैं रहूँ न रहूँ मेरी चाहें रहेंगी

हर कदम पर बुलन्दी कदम चूमे तेरे
इस तरह की मेरी सब दुआयें रहेंगी

अक्ल के शहर में आ गया एक पागल
कब तलक बेगुनाह को सजायें रहेंगी

आजकल बिक रही दौलतों से बहारें
बस अमीरें के घर में फिजायें रहेंगी

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2014 at 9:34pm

आ. उमेश भाई , बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही ! दिली बधाई कुबूल करें ।

Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 1:18pm

आजकल बिक रही दौलतों से बहारें
बस अमीरें के घर में फिजायें रहेंगी...........सुन्दर  रचना ,बधाई  श्री उमेश  कटारा जी !

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2014 at 1:18pm

आदरणीय बहुत प्यारी ग़ज़ल //बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 2, 2014 at 11:12am

उम्दा गजल  रचना के लिए बधाई  श्री उमेश  कटारा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 2, 2014 at 1:31am
खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2014 at 3:50pm

//आजकल बिक रही दौलतों से बहारें
बस अमीरें के घर में फिजायें रहेंगी//
वाह वाह, बढ़िया शेर हुआ है, अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है, बधाई स्वीकार करें आदरणीय उमेश जी ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 30, 2014 at 10:08am

हर कदम पर बुलन्दी कदम चूमे तेरे
इस तरह की मेरी सब दुआयें रहेंगी-----ये सदा  दिल से मेरी  दुआएं रहेंगी  कर के देखिये 

सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ० उमेश कटारा जी हार्दिक बधाई 

Comment by somesh kumar on November 30, 2014 at 9:43am

कोई पागल कहे या कहे फिर दिवाना
बस तेरे वास्ते ही व़फायें रहेंगी

चाहता ही नहीं मैं तुझे भूलजाना 
मैं रहूँ न रहूँ मेरी चाहें रहेंगी

गज़ल को कई बार पढ़ा और उसमें घुले हो प्रेम में डूबता गया |सुंदर गज़ल 

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