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सहेजना  

बिखराव में समझ आता है

सहेजे का मोल

मनचाही चीज़ जब

आसानी से नहीं मिलती तो

याद आती है माँ/पत्नी//बहन  

सुबह-सुबह खाना पकाती

सेकेण्ड-सुई से रेस लगाती

हर पुकार पे प्रकट हो जाती

मुराद पूर्ण कर फिर जाती

कितना आसान बना देती है

ज़िन्दगी को,माँ/पत्नी/बहन  

सहेजना एक कौशल है

पर रोज़-रोज़ एक जैसे

को सहेजना बिना आपा खोये

समर्पण है प्यार है त्याग है

औरतें रोज़ इन्हें सहेजती हैं

और एक घर-घर बना रहता है |

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2014 at 9:52pm

सत्य कथन ! आदरणीय औरत से ही चार दीवार से घिरा स्थान घर कहलाने लगता है ! दिली बधाइयाँ रचना के लिये !

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2014 at 1:26pm

वाह भाई बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति  //बधाई आपको 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 2, 2014 at 1:12pm

बिखराव में समझ आता है

सहेजे का मोल....सुन्दर एवं सत्य जीवन दर्शन ,हार्दिक  बधाई सोमेश जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 2, 2014 at 3:02am
बहुत अच्छे भाव.एक बेहद संवेदनशील मन चाहिए ऐसी रचना की सृष्टि के लिए....लेकिन पाठक की तृष्णा बनी रह गयी. कितना और आनंद आता यदि इस रचना को थोड़ा सा और विस्तार देने की चेष्टा होती. ऐसी अपेक्षा इसलिए कि आप ऐसा करने में सक्षम हैं...नहीं तो रचना तो अपने आप में सुंदर है ही आदरणीय. शुभकामनाएँ. सादर.
Comment by somesh kumar on December 1, 2014 at 11:03pm

शुक्रिया !अपनी अनुभवी दृष्टी से रचना को स्वीकर करने हेतु ,आप दोनों गुरु-मित्रों का 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2014 at 10:55am

सुन्दर अभिव्यक्ति  i  नारी के विविध रूपो का कल्याणकारी चित्रण  i

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 30, 2014 at 9:48pm

बिलकुल सही,  सहेजना , सजाना, परोसना, आदि कार्य घर की महिलाएं, माँ बहन, पत्नी, गृहिणी बखूबी करती हैं... 

Comment by somesh kumar on November 30, 2014 at 3:37pm

उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया भाई जी 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2014 at 3:00pm

सोमेश जी, बिलकुल यथार्थ बात कही है, घर को घर नारी ही बनाती है वरना दीवारों और छत से ढका स्ट्रक्चर तो गोदाम भी होता है। बधाई इस रचना पर।

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