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ग़ज़ल--उमेश कटारा

क्या पता किस ख़ुदा ने बनायी मोहब्बत
पत्थरों से मुझे फिर करायी मोहब्बत

उसकी आँखों में सारा जहाँ मिल गया था
उसने हँसके ज़रा सा ज़तायी मोहब्बत

वो मेरा हा गया ,हो गया मैं भी उसका
हमने बर्षों तलक फिर निभायी मोहब्बत

रोज मिलने लगे ,सिलसिला चल पड़ा था
चाँद तारों से मैंने सजायी मोहब्बत

पर खुदा हमसे नाराज रहने लगा तो
दिलजलों की तरह फिर जलायी मोहब्बत

हो गये हम दिवानों से मशहूर दोनों
दुश्मनों ने बहुत फिर सतायी मोहब्बत

ख़ाक में मिल गयी ,पल में बर्षों की चाहत 
फ़िरतो हँस हँसके सबने उड़ायी मोहब्बत

उमेश कटारा 
मौलिक व अप्रकाशित



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Comment by umesh katara on December 3, 2014 at 6:35pm
Comment by umesh katara on December 3, 2014 at 6:35pm

शुक्रिया Sushil Sarna जी

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2014 at 4:35pm

ख़ाक में मिल गयी ,पल में बर्षों की चाहत
फ़िरतो हँस हँसके सबने उड़ायी मोहब्बत .... वाह मित्र बहुत सुंदर ग़ज़ल।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 12:26pm

मित्र

आपकी गजल अच्छी है  i

Comment by Shyam Narain Verma on December 3, 2014 at 12:21pm

बहुत सुन्दर गजल  ! आपका बधाई !

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