छुपा कर दिल में रक्खी थी
बचपन में बनी प्रेम कहानी थी
तुम्हारे जिस पर नाम लिखे थे
दीवार वो, बहुत पुरानी थी
पगली ,इश्क में तेरे दीवानी थी
तूने फ़ौज मैं जाने की ठानी थी
तुझे सेहरा बाँध के आना था
निकाह की रस्म निभानी थी
कुछ अजब तौर की कहानी थी
तेरी लाश तिरगे में आनी थी
उठ गए थे खुनी खंज़र
जान तो जानी ही थी
अरे आसमां से तो पूछ लेता
खुदा गर तुझे ,बिजली गिरानी थी
तू चाहता तो बक्श देता, ए खुदा
पर तुझे, दो नयी मज़ार बनानी थी !!
"मौलिक व अप्रकाशित"
Comment
आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीय श्री गणेश जी"बागी "जी !"आपकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से ,प्रयास करता रहूँगा ! हार्दिक आभार !
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छुपा कर दिल/ में रक्खी थी
वो बचपन की/ कहानी थी .
तनिक संयत होकर प्रयास करते रहें।
bahut hi khoob ....gambhir rachna ke liye .....badhayi
आपका हार्दिक आभार महर्षि त्रिपाठी जी !
बधाई स्वीकारें आ.
बहुत बहुत धन्यवाद् आपका पाठक जी !
बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है आदरणीय //हार्दिक बधाई आपको
"रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारी जी !"आपने बिलकुल सही कहा ,प्रयास तो वही था पर ग़ज़ल की विधा का ज्ञान न होने के कारण "तरही मिसरे पर ग़ज़ल" में भाग नहीं ले पाया ,आपकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से ,प्रयास करता रहूँगा ! हार्दिक आभार !
रचना पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय डॉ ० विजय शंकर जी !
आप रचना को समय देते हैं ,निष्कर्ष निकालने का प्रयास करतें है , हार्दिक आभार सोमेश भाई ! पुनः धन्यवाद !"
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