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तेरा दिया जन्म,मुझे स्वीकार नहीं

तेरा दिया जन्म

मुझे स्वीकार नहीं

जन्म स्थान

मुझे स्वीकार नहीं

यह नाम

मुझे स्वीकार नहीं

स्वीकार नहीं मुझे

कर्म करना, और   

भाग्य से बंध जाना

मुझे स्वीकार नहीं

स्वीकार नहीं मुझे

तेरे तथा-कतिथ दूतों के

नैतिकता-अनैतिकता के निर्देश

उनके छल भरे उपदेश

तेरे नाम पर रचे, उनके

षडयन्त्र भरे परिवेश

मैं विद्रोही तेरी माया का

आ ,मुझे नरसिंह बनकर

हिरण्यकश्यप की तरह मार दे

या बुद्ध बना कर मुझे  

मध्य मार्ग पर उतार दे !!  

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Views: 640

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on December 18, 2014 at 12:54pm

आदरणीय योगराज प्रभाकर सर सबसे पहले विलम्ब से अपनी प्रतिक्रिया के लिए क्षमा, दरअसल कुछ समय से बाहर था, आपके उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार !  

Comment by Hari Prakash Dubey on December 18, 2014 at 12:44pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी रचना पर आपके स्नेह के लिए शुक्रिया !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 18, 2014 at 12:42pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 18, 2014 at 12:40pm

आदरणीय राहुल डांगी जी आपको रचना पसंद आयी,आपका आभार !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 2:46pm

आपके ये विद्रोही तेवर अच्छे लगे भाई हरि प्रकाश दुबे जी, वाह !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2014 at 4:14pm

वाह ! भाई हरि प्रकाश जी , बहुत सुन्दर ! बधाइयाँ ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 5, 2014 at 12:46pm

आदरणीय

अंतिम चार लाईना  ने कविता में चार चाँद लगाये  i  बुद्ध के मध्यम वर्ग की  अवधारणा  जो महीयान सम्प्रदाय  के रूप में विकसित हुयी उसका आलंबन रचना को विशिष्ट  बनाता है i सादर i

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 5, 2014 at 11:06am
वाह वाह वाह वाह दिल छू गयी ये कविता वाह
Comment by Hari Prakash Dubey on December 4, 2014 at 11:50pm

श्री नीरज मिश्र जी आपने तो एक लाख बधाई दे कर मेरा रक्त संचार बढ़ा दिया ,आपको भी एक लाख बार धन्यवाद !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 4, 2014 at 11:47pm

सुश्री  सीमा तिवारी जी आपकी टिप्पणी ने उत्साह बढ़ा दिया है ,हार्दिक धन्यवाद आपका !

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