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गज़ल ~ फिर मेरे होँठोँ की तुम

2122 2122 2122 212

फिर मेरे होँठोँ की तुम मुस्कान लेकर आ गये ।
जा रही थी जिन्दगी तुम जान लेकर आ गये ।

ख्वाबोँ के उजडे शहर मेँ कोई दस्तक हो गयी ,
तुम सजाकर फिर नये अरमान लेकर आ गये ।

मेरी किस्मत ने दिखाई और ही तस्वीर थी ,
जिन्दगी की तुम अलग पहचान लेकर आ गये ।

प्यार खुशबू सादगी अहसास नग्मा आरजू ,
दिल मेँ तुम कितने हँसी मेहमान लेकर आ गये ।

आज तो मौसम जुदा है आज आलम और है ,
तुम बदलते वक्त का फरमान लेकर आ गये ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज

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Comment by Madan Mohan saxena on December 11, 2014 at 4:32pm

प्यार खुशबू सादगी अहसास नग्मा आरजू
दिल मेँ तुम कितने हँसी मेहमान लेकर आ गये

अच्छी गज़ल

Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on December 11, 2014 at 10:24am
बहुत बहुत आभार प्रकट करता हूँ आपका आदरणीय संपादक महोदय जी ।
जी मेरे भी खयाल मेँ भी आया था ये पर मैने सोचा शायद ऐसे ही रखना ठीक रहेगा । पर आपने जानकारी दी है उसके लिये बहुत बहुत शुक्रिया । मै इसको सुधार लेता हूँ । मै एक निवेदन आपसे और करना चाहता हूँ मै यहाँ अपनी पुरानी गज़लोँ मेँ सुधार करना चाहता हूँ और उसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ क्योँ कि आपको पुनः approvel देने की कृपा करनी होगी आप चाहेँगे तो मै ये कर सकूँगा ,सादर ।
Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on December 11, 2014 at 10:16am
धर्मेन्द्र जी बहुत बहुत आभार प्रकट करता हूँ ।
Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on December 11, 2014 at 10:15am
राहुल दंगी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया अदा करता हूँ ।
Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on December 11, 2014 at 10:13am
सोमेश जी आपने जिस तरीके से गज़ल पर आ करके गज़ल के रूप मेँ तारीफ की है बधाई दी है उसके लिये मै आपका बहुत बहुत शुक्रगुज़ार हूँ बहुत बहुत आभार प्रकट करता हूँ ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 2:50pm

//प्यार खुशबू सादगी अहसास नग्मा आरजू ,
दिल मेँ तुम कितने हँसी मेहमान लेकर आ गये ।//

अच्छी गज़ल हुई है भाई नीरज मिश्रा जी, बधाई स्वीकारें। सानी में शब्दों के मध्य कॉमा देना क्यों भूल गए ? क्या आप जानते हैं कि इस तरह से मिसरा कहना ग़ज़ल का एक मुहासिन कहलाता है जिसे तेवर कहते हैं ?

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:34pm

अच्छे अश’आर हुए हैं नीरज जी, दाद कुबूल कीजिए

Comment by Rahul Dangi on December 5, 2014 at 11:10am
वाह बहुत सुन्दर गजल नीरज भाई
Comment by somesh kumar on December 4, 2014 at 10:55pm

प्यार को गुनगुनाती गज़ल है आपकी 

हंसती और मुस्कुराती गज़ल है आपकी 

है जब  फैली निराशा और अंधेरगर्दी 

आशा औ' उजाला जगती गज़ल आपकी 

Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on December 4, 2014 at 10:23pm
बहुत बहुत शुक्रिया कंवर करतार साहब ।

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