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     वह चालीस वर्ष का हट्टा –कट्टा जवान था I बस में मेरी खिड़की के करीब आया I डबडबायी आँखों से मेरी ओर देखा –‘बाबू जी मेरी माँ अस्पताल में दम तोड़ रही है, उसकी दवा लेने गया था, फकत इक्कीस रुपये कम पड़ गए है I बाबू जी आप मेहरबानी कर दे तो मेरा माँ शायद बच जाय I अल्लाह आपको नेमते देगा I’

      उसकी आँखों से आंसू  छलक पड़े I मुझे तरस आ गया I मैंने उसे रुपये दे दिए I वह दुआ देता आँखों से ओझल हो गया I  

      किसी कारण से मेरी बस वही रुकी रही I इतने में दूसरी बस आ गई I मैंने देखा वही व्यक्ति फिर हठात प्रकट हुआ i उसकी आँखे फिर डबडबाई I वह दूसरी बस के एक मुसाफिर को संबोधित कर बोला- बाबू जी मेरी माँ अस्पताल में दम तोड़ रही है------

 

 (मौलिक /अप्रकाशित)

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 12:58pm

जवाहरलाल जी

आपने वजा फरमाया  i ठगना भी एक आर्ट है i

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 22, 2014 at 12:40pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी, आपने सुना होगा दिल्ली में अंधे का नाटक कर भीख माँगने वाले व्यक्ति को चर्चित फिल्म PK में अभिनय करने का चांस मिला.  अब इसे क्या कहेंगे ..एक कलाकार को बढ़ावा या नाटक कर भीख माँगनेवाले की 'ताजपोशी' ..सादर!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 9:34pm

विजय् सर !

आपका ह्रदय से आभार  i सादर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 21, 2014 at 8:48pm
कुछ लोग कमा के कहते हैं ,
कुछ मांग कर काम चलाते हैं ।
हर वर्ग संवर्ग में भरे पड़े हैं ऐसे लोग। एक संस्कृति है इनकी भी , कला है, हमीं लोगों
का प्रोत्साहन भी रहता है. सदियों से चल रहा है. लागु कथा सुन्दर , बधाई डॉ o गोपाल नारायण जी।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:27pm

जीतू जी

आपको स्वस्थ और सक्रिय देखकर मन को अच्छा लगा i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:25pm

हरिवल्लभ जी

ऐसे ही अनुभवों से भावुकता मुर्खता लगने लगती है i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:24pm

योगेन्द्र जी

यह लघुकथा सत्य घटना पर आधारित है i  सस्नेह i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:23pm

सोमेश कुमार जी

आपका कथन सही है i  सस्नेह i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:22pm

हरि प्रकाश जी

आपका अनुमोदन प्रेरक भी है i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 21, 2014 at 8:21pm

श्याम नारायन  वर्मा जी

आपका आभार  श्रीमन i

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