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 हाँ

किसी अज्ञात यात्रा से

लोग यहाँ  आते है

कोई आता है चुपके से दुबक कर

कोई आता है सीने से चिपककर

कोई आता इन्तेजार ख़त्म करने

किसी के आने पर बजते है नगाड़े

ढोल-ताशे   

 

यहाँ आकर

फिर शुरू होती है एक नयी यात्रा

गंतव्य तक जाने की मंजिल पाने की

परिश्रम गंवाने की कुछ सुस्ताने की

जी भर रोने की मन-मैल धोने की

शांति से सोने की खुद अपने होने की

 

जो अभी यहीं है

उन्हें कही जाना है

किसी से किया हुआ वादा निभाना है

उन्हें इन्तेजार है  उस घड़ी आने की

जब कोई गाड़ी उन्हें ले जायेगी

हो सकता है वहां  जहाँ वह चाहते हों

शायद वहां भी जहाँ नहीं चाहते

 

एक् लम्बा सिलसिला है

आने-जाने वालो को

इसीलिये रहती है यहाँ एक भीड़ बड़ी

जहाँ देखो वही एक लम्बी सी लाइन खडी

मै भी खड़ा हूँ यहाँ जीवन की रेल के

छोटे प्लेटफार्म पर कभी तो आयेगी

नींद से जगाएगी मुझे ले जायेगी 

छुक-छुक रेलगाड़ी   

 

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 19, 2014 at 11:14am

महनीया राजेश कुमारी जी

आपका शत शत आभार i सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 18, 2014 at 8:53pm

अपनी अपनी बारी के इन्तजार में हम सब उसी नौका में सवार हैं आदरणीय ..जीवन के इस चक्र से कोई बच कर भी तो नहीं जा सकता और ये भी सच है पुराने पत्ते झड़ेंगे तभी तो नए आयेंगे .....आध्यात्मिक सोच को लिए ये अभिव्यक्ति बहुत शानदार हुई ...हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 5:27pm

शिज्जू भैय्या

आप सब का प्रेम प्रतिफलित होता रहे   i सादर i  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 5:25pm

नीरज  जी

आप तो 'प्रेम ' हैं ही i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 5:25pm

आ0 सौरभ जी

आपका अनुमोदन  आश्वस्तिदायक है i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 5:23pm

आ0 अनुज

आपका हार्दिक आभार i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2014 at 7:56pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर आप बातों ही बातों में गहरी बात कह जाते हैं बड़ी खूबसूरत रचना हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Neeraj Nishchal on December 17, 2014 at 10:34am
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है आदरणीय गोपाल नारायण जी बहुत बहुत बधाई ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 17, 2014 at 10:15am

आदरणीय गोपाल नारायनजी, यात्रा की अभिव्यंजना पर आत्मनिवेदन तथा सरल शब्दों में संप्रेषण भला लगा है. वेदों में उद्धृत जीवनक्रम को इंगित करता ’चरैवेति-चरैवेति’ का प्रारूप स्थूल-सूक्ष्म, भौतिक-अभौतिक चरणों में चलता रहता है.

आपकी इस रचना के लिए हार्दिक धन्यवाद तथा शुभकामनाएँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2014 at 9:03am

आ. बड़े भाई , सारी जीवन यात्रा को आपने बहुत खूबसूरती से चन्द लाइनों मे बयाँ कर दिया है , बहुत बहुत बधाइयाँ ।

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