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गीत - आने वाला नया, नया कब रह पाता है ( गिरिराज भंडारी )

नया कहूँ तो, वैसे तो हर पल होता है

नया जागता तब है जब पिछला सोता है 

पर सोचो तो नया , नये में क्या होता है

हर पल पिछला, आगे को सब दे जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही गरीबी , भूख , वही है फ़टी रिदायें 

वही चीखती मायें , जलती रोज़ चितायें

वही पुराने घाव , वही है टीस पुरानी

वही ज़हर, बारुद, धमाका रह जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही अक़्ल के अंधे , जिनके मन जंगी हैं

वही बांटते नफरत सारे आतंकी हैं

वही बात में शांति, होड़ है हथियारों की

स्वेत कबूतर ऐसे में कब उड़ पाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

कब तक पतझड़ झेलें, कब तक आस रखें हम

पागल बाग उजाड़े , औ मधुमास तकें हम 

खुद से लड़ के झड़ते पत्ते सिर्फ लखें हम

पत्तों का विद्रोह वृक्ष कब सह पाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

ऐसे में किस पल को बोलो नया कहूँ मैं

जब हर नव-पल वही पुराना दर्द सहूँ मै

कब तक भीतर-भीतर, कितना और दहूँ मै

नव वर्ष बधाई दिल मेरा न दे पाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 9:13pm

आदरणीय जवाहर भाई , गीत की सराहना के लिये आपका दिली आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 9:12pm
आदरणीय बड़े भाई विजय निकोरे जी , गीत को आपका आशीष मिला , बहुत खुशी हुई ! सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 23, 2014 at 8:14pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय श्री गिरिराज भंडारी जी!

Comment by vijay nikore on December 23, 2014 at 3:37pm

बहुत ही  सुन्दर प्रस्तुति। शीर्षक ने ही मोह लिया। और फिर......

//कब तक पतझड़ झेलें, कब तक आस रखें हम

पागल बाग उजाड़े , औ मधुमास तकें हम 

खुद से लड़ के झड़ते पत्ते सिर्फ लखें हम

पत्तों का विद्रोह वृक्ष कब सह पाता है//  ............. कितना सच !

हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 2:31pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया । आने वाले नये साल की आपको भी बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 2:29pm

आदरणीययोगेन्द्र भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by khursheed khairadi on December 23, 2014 at 12:27pm

वही अक़्ल के अंधे , जिनके मन जंगी हैं

वही बांटते नफरत सारे आतंकी हैं

वही बात में शांति, होड़ है हथियारों की

स्वेत कबूतर ऐसे में कब उड़ पाता है

आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब |सभी बंध अच्छे है |शायद नया कुछ नया लेकर आये ,इसी आस में आपको नववर्ष की शुभकामनाएं वर्तमान हालात में उपजी निराशा को आपने सबल स्वर दिया है |सादर अभिनन्दन  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 8:57am

प्रिय अनुज सोमेश , स्नेहिल सराहना के लिये बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 8:55am

आदरणीय शिज्जु भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 8:54am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , गीत आपका आशीष पा प्रफुल्लित है । स्नेहिल सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

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