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कुछ नक्शा बदला है \ माहिया, क़िस्त-तीन (मिथिलेश वामनकर)

मेरा मन दरपन है।

देखी छब तेरी,

आँखों में सावन है।

 

वो पागल लडकी है।

ऐसी बिछडन में.

वो कितना हँसती है।

 

क्यूँ उलटा चलते हो।

वक़्त सरीखे तुम,

हाथों से फिसलते हो।

 

जब शाम पिघलती है।

ऐसे आलम में,

क्यूं रात मचलती है।

 

सूरज को मत देखों ।

उसका क्या होगा,

चाहे पत्थर फेंकों ।

 

सूरज ने पाला है।

हँसता रातों में,

ये चाँद निराला है।

 

तारें  भी डरते है।

सूरज काला है,

छिप-छिप के विचरते है।

 

ये कौन बुलाता है।

भीतर ही भीतर.

मन हाथ हिलाता है।

 

मन पतझड़ जैसा है।

रस्तों में पत्ते,

फिर रस्ता भूला है ।

 

बरसों में  लौटा  हैं।

दिल भी बदलें है,

कुछ नक्शा बदला है।

 

ना आज महकता है।

खुशबू सनकी है,

ये फूल दहकता है ।

 

छब मेरी लाड़ो की।

याद करे दिल तो,

वो ओट किवाड़ो की ।

 

गम एक  खिलाड़ी  है।

खुशियाँ क्या जाने,

दिल एक  अनाड़ी  है।

 

पलभर जी जाने दो।

मेरी साँसों का,

बस क़र्ज़ चुकाने दो।

 

यूं शब भर मत गाओ।

थक जाओगे तुम,

तारों अब सो जाओ।

 

 

-------------------------------------------------------

(मौलिक व अप्रकाशित)  - मिथिलेश वामनकर 

-------------------------------------------------------

 

माहिया

22-22-22  - फैलुन-फैलुन-फैलुन 

22-22-2    - फैलुन-फैलुन-फ़ा

22-22-22  - फैलुन-फैलुन-फैलुन

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 18, 2015 at 2:35pm

आदरणीय नितिन गोयल जी, माहिया का बहुवचन संभवतः माहिए होता है, माहिए आपको पसंद आये, जानकार आश्वस्त हुआ. सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. सादर 

Comment by Nitin Goyal on August 18, 2015 at 1:18pm
मिथिलेश जी माहिया पढ़ के अच्छा लगा,माहिया का बहुवचन भी माहिया होता है क्या ? मैं भी लिखने का प्रयास करूंगा पथप्रदर्शन कीजियेगा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 29, 2015 at 3:22am

आदरणीय आशुतोष जी आपकी सदाशयता, आत्मीयता और स्नेह से अभिभूत हूँ 

हार्दिक आभार 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 28, 2015 at 1:20pm

आदरणीय मिथिलेश जी //आज का सफ़र एक नयी जानकारी के साथ आगे बढ़ रहा है .उम्दा फिर से बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 10:19pm

आदरणीय जवाहर सिंह जी .... सही कहा आपने। सराहना के लिए हार्दिक आभार।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 24, 2014 at 8:31pm

एक नए विधा में रचना अति सुन्दर लगी ...इस मंच की यही खासियत है नयी विधा, नए शब्द विन्यास, कथ्य और भावों में सजगता आदि ...आदि!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 23, 2014 at 4:26pm
परम आदरणीय विजय निकोर सर इस प्रयास की सराहना और उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार। आपका स्नेह और आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे, इसके लिए सदैव प्रयासरत रहूंगा।
Comment by vijay nikore on December 23, 2014 at 3:57pm

वाह ! अति सुन्दर, मनमोहक माहिया के लिए बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 23, 2014 at 11:12am

आदरणीय गिरिराज सर, आपको माहिया पसंद आये हार्दिक आभार.

माहिया 3-मिसरों की उर्दू काव्य  में एक विधा है जिसमें पहला मिसरा और तीसरा मिसरा हम क़ाफ़िया और हमवज़्न  होते हैं और दूसरा मिसरा हमकाफ़िया हो ये ज़रूरी नहीं है लेकिन दूसरे मिसरे में 2-मात्रा कम होती है। पंजाबी में माहिया बहुत कहे गए है ।  जगजीत सिंह जी  व चित्रा सिंह जी द्वारा गाये गए माहिया प्रसिद्द है इसकी लय बहुत मीठी है .इस लिंक से यूट्यूब पर सुने जा सकते है  http://youtu.be/5CV6w01O95Q

हिन्दी फ़िल्म फ़ागुन में ओ पी नैय्यर जी के संगीत से सजे मुहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले जी द्वारा गाये माहिया  इस लिंक से सुने जा सकते है http://youtu.be/PxCJUCGb2_c

तुम रूठ के मत जाना
मुझ से क्या शिकवा
दिवाना है दिवाना

यूँ हो गया बेगाना
तेरा मेरा क्या रिश्ता
ये तू ने नहीं जाना

उर्दू शायरी में माहिया के लिए निम्न बुनियादी औज़ान मुकर्रर हैं

22-22-22  - फैलुन-फैलुन-फैलुन 

22-22-2    - फैलुन-फैलुन-फ़ा

22-22-22  - फैलुन-फैलुन-फैलुन

पहला मिसरा और तीसरा मिसरा हम क़ाफ़िया और हमवज़्न  होते हैं जिसमे बारह मात्रा होती है  जिससे 16 प्रकार के वज्न बनाए जा सकते है अर्थात एक गुरु के स्थान पर दो लघु लिए जा सकते है या लघु गुरु लघु के क्रम में किये जा सकते है किन्तु मिसरे के अंत गुरु 2 अनिवार्य है .

दूसरा मिसरा हमकाफ़िया हो ये ज़रूरी नहीं है लेकिन दूसरे मिसरे में दस मात्रा होती है  जिससे 8 प्रकार के वज्न बनाए जा सकते है अर्थात एक गुरु के स्थान पर दो लघु लिए जा सकते है या लघु गुरु लघु के क्रम में किये जा सकते है  किन्तु मिसरे के अंत गुरु 2 अनिवार्य है .

सादर 

Comment by somesh kumar on December 23, 2014 at 10:10am

अब छोड़ नहीं सकता 

मौसम बिगड़ा है 

साथ लिए चलना |

साथी जब मान लिया 

मन का उलझना क्या 

साथ लिए बढना 

कृपया ध्यान दे...

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