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फूल नहीं तो पत्थर कह दो

फूल नहीं तो पत्थर कह दो।
दो बातें पर हंसकर कह दो ।।

आज मुकम्मल कर दो ऐसे ।
एक दफे बस दिलबर कह दो ।।

साथ चलूँगा मरते दम तक।
मुझको अपना रहबर कह दो।।

माँ बाबा की बात सुने सब।
ऐसा सपनों में घर कह दो ।।

ऊँच नीच सम भाव रहा जो।
उसको भी तो बेहतर  कह दो।।

सदियों तक सुनने में आये। 
एक ग़ज़ल बस जमकर कह दो।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Views: 961

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on December 29, 2014 at 3:58pm
हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी।।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 28, 2014 at 3:20pm

फेलुन फेलुन .. के संयोजना पर आपकी प्रस्तुतियाँ सधी हुई आती हैं. कई शेर गुनगुनाने लायक हुए हैं. इस उम्दा प्रयास के लिए बधाइयाँ लें.

Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 2:59pm
आदरणीय लक्ष्मण जी बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 2:57pm
शिज्जू भाई बहुत बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 2:57pm
राहुल भाई बहुत आभार आपका
Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 2:56pm
आदरणीय गिरिराज जी बहुत आभार आपका।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 1:43pm

आदरणीय  लक्ष्मण रामानुज लडीवाला सर भाव को पूर्ववत करने के लिए में को का कर सकते है 

माँ बाबा की बात सुने सब।
ऐसा सपनों में का घर कह दो ।।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 28, 2014 at 11:47am

  श्री  मिथिलेश वामनकर जी से मापनी में संशोधन बाद सुंदर गजल  रचना बन गई | यह  अवश्य है की आपकी इन पंक्तियों में जो भाव थे वे कुछ  बदल गए दिख रहे है - 

माँ बाबा का आज्ञाकारी।। 
ऐसे घर को भी घर कह दो।।.

सुंदर प्रयास  के  लिए  हार्दिक  बधाई श्री राम शिरोमणि  पाठक जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 28, 2014 at 10:33am

अच्छी ग़ज़ल है भाई राम शिरोमणि जी बहुत बहुत बधाई हो

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 28, 2014 at 9:57am
वाह वाह वाह बहुत सुन्दर!

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