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''माँ भैया का अंतरजातीय विवाह तो आपने आसानी से स्वीकार कर लिया था फिर मेरे अंतरजातीय विवाह के लिए इंकार क्यों कर रही हो.'' छोटे बेटे ने माँ से बहस करते हुए कहा.

माँ ने कहा, "उसने तो हमसे उच्च वर्ग की लड़की पसंद की थी पर तुम्हारी पसंद तो हम से नीची जाति की है. नीची जाति की लड़की हम कैसे स्वीकार कर सकते हैं."

-श्रद्धा थवाईत

मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2015 at 8:01pm

अच्छा विषय उठाया है आपने , बधाई ।

Comment by harikishan ojha on January 7, 2015 at 10:46am

बधाई हो बहुत अच्छी लगी

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 6, 2015 at 6:45pm

एक अनूठे विषय पर, बहुत ही बढ़िया लघुकथा आदरणीया श्रद्धा जी. बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on January 6, 2015 at 5:20pm

आदरणीया श्रद्धा थवाईत जी, लघुकथा को सार्थक करती  सुन्दर प्रस्तुति  के लिए हार्दिक बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 6, 2015 at 3:27pm

रूढिग्रस्त मानसिकता  को पोल खोलती कथा i

Comment by somesh kumar on January 6, 2015 at 10:38am

sunder vishy aur achi prstuti hai is lghuktha me


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 5, 2015 at 9:22pm

सदियों से बेटे और बेटी के लिए एक ही नियम लागू नहीं हुआ है, इस कहानी में भी यही तत्व उभर कर सामने आ रहा है, बधाई आदरणीया श्रद्धा जी. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 5, 2015 at 8:17pm

सफल लघुकथा ....बढ़िया और सन्देश सम्प्रेषण में सफल प्रस्तुति  के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें....

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