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भला क्या ? |
बुरा क्या ? |
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खुदी से |
मिला क्या |
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शज़र फिर |
फला क्या ? |
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लिखे बस |
पढ़ा क्या ? |
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फलक था |
गिरा क्या ? |
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कहे बस |
सुना क्या ? |
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नहीं दम |
चला क्या ? |
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गजल ये |
क़ता क्या ? |
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कटे पर |
हवा क्या ? |
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मुहब्बत |
दवा क्या ? |
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(मौलिक व अप्रकाशित) © मिथिलेश वामनकर |
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Comment
वाह कमाल मज़ा आ गया वाह बहुत खूब है सर
आदरणीय मिथिलेश जी इक-रुक्नी ग़ज़ल में अर्थों और भावों के साथ शेरियत भी बख़ूबी निभाई है आपने |सादर अभिनन्दन |
कहीं नसीहत ,कहीं सवाल,इस रूप में ,अच्छी मिशाल |जो भी लिखते हो बस -कमाल ही कमाल
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