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"आप का नाम क्या है ?" बगल में आई नयी पड़ोसन ने पूछा |
वो सोच में पड़ गयी , क्या बताये | शादी के बाद जब से इस घर में आई है तब से तो किसी ने उसके नाम से नहीं पुकारा | शुरू में बहू , फिर मुन्ने की माँ और अब मिसेस शर्मा , यही सुनती आई है वो | शायद तीस साल बहुत होते हैं किसी को खुद का वजूद भूलने के लिए | वो अपना वजूद ढूँढ रही थी , पड़ोसन चली गयी थी |

.

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 31, 2015 at 10:06am

बहुत बहुत आभार आदरणीय वीर मेहता जी..

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 31, 2015 at 9:58am

Sach ko chooti huyi saarthak katha.....Vaastav me andhikaash mahilaho ka naam unke vajood ki tarah rishato me kho jaata hai.

Comment by विनय कुमार on January 30, 2015 at 8:51pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जीतेन्द्र पस्तरीया जी..

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 30, 2015 at 8:36pm

बहुत सुंदर. एक महीन से पहलु पर, पूर्ण लघुकथा. बधाई आदरणीय विनय जी

Comment by विनय कुमार on January 30, 2015 at 7:37pm

आप बिलकुल सही कह रहे हैं , आज भी गांवों में ये होता है | शुक्रिया ..

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:23pm

हा.. हा... हा.. बस मजाक था विनय भाई  , कोई सवाल नहीं था ,मुझे पता है आज भी गाँव मैं ऐसा ही होता है ! चलिए आनंद आ गया !;-)

Comment by विनय कुमार on January 30, 2015 at 7:18pm

आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , बहुत बहुत आभार रचना पर दृस्टि डालने के लिए | दरअसल पहले पति भी पत्नियों को उनके बच्चे की माँ कहकर ही बुलाते थे | 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 6:54pm

आदरणीय विनय जी, सुन्दर रचना , एक सवाल मन में आ रहा है , उनके पति उन्हें किस नाम से बुलाते होंगे ...हा ..हा .हा .बस एक मजाक ....हार्दिक बधाई आपको !

Comment by विनय कुमार on January 30, 2015 at 2:22am

बहुत बहुत आभार मिथिलेश वामनकर जी , आपके उत्साहजनक शब्द बहुत सम्बल देते हैं |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 30, 2015 at 1:13am

आदरणीय विनय जी बहुत ही बेहतरीन लघुकथा है. अपने शीर्षक से पूर्णतः न्याय करती सफल लघुकथा. बहुत बहुत बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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