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बदन पे वही लिबास भाई।

22 22 22 22
बदन पे वही लिबास भाई।
दिखता फिर से उदास भाई।।

कड़वी बातें क्यों करते हैं।
कुछ तो रखिये मिठास भाई।।

वादों की बौछार न करिये।
सच में हो इक प्रयास भाई।।

मरा भूख से फिर भी देखो।
लगते क्या क्या कयास भाई।।

चाँद तारे किस काम के जब।
दीपक से घर उजास भाई।।
********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 10:00am
आदरणीया प्रतिभा जी हार्दिक आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 9:59am
उत्साह वर्धन हेतु हार्दिक आभार भाई शिज्जू जी।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 9:58am
आदरणीय सुशील जी हार्दिक आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 9:58am
आदरणीय हरि प्रकाश जी हार्दिक आभार।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 8:55am

वाह भाई राम शिरोमणि जी बहुत अच्छी रवां ग़ज़ल है दाद कुबूल फरमायेँ

Comment by Sushil Sarna on January 31, 2015 at 8:18pm

वाह आदरणीय बहुत ही सुंदर ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने    … हार्दिक बधाई। 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 31, 2015 at 6:56pm

आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी .....

मरा भूख से फिर भी देखो।

लगते क्या क्या कयास भाई।।...   बहुत खूब ,सुन्दर रचना  !

Comment by ram shiromani pathak on January 31, 2015 at 3:55pm
आदरणीय श्याम नारायण जी हार्दिक आभार आपका।सादर
Comment by ram shiromani pathak on January 31, 2015 at 3:53pm
श्याम जी हार्दिक आभार आपका।सादर
Comment by ram shiromani pathak on January 31, 2015 at 3:52pm
आदरणीय गोपाल नारायण जी हार्दिक आभार।

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