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ग़ज़ल : ख़ुद को दुहराने से है अच्छा रुक जाना

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

फिर मिल जाये तुम्हें वही रस्ता, रुक जाना

ख़ुद को दुहराने से है अच्छा रुक जाना

 

उनके दो ही काम दिलों पर भारी पड़ते

एक तो उनका चलना औ’ दूजा रुक जाना

 

दिल बंजर हो जाएगा आँसू मत रोको

ख़तरनाक है यूँ पानी खारा रुक जाना

 

तोड़ रहे तो सारे मंदिर मस्जिद तोड़ो

नफ़रत फैलाएगा एक ढाँचा रुक जाना

 

पंडित, मुल्ला पहुँच गये हैं लोकसभा में

अब तो मुश्किल है ‘सज्जन’ दंगा रुक जाना

-----

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 16, 2015 at 10:28am

फिर मिल जाये तुम्हें वही रस्ता, रुक जाना

ख़ुद को दुहराने से है अच्छा रुक जाना

दिल बंजर हो जाएगा आँसू मत रोको

ख़तरनाक है यूँ पानी खारा रुक जाना  ---- क्या बात है , आदरणीय धर्मेन्द्र भाई  , बहुत बढ़िया गज़ल कही है आपने , दिली मुबारकबाद कुबूल करें ॥

Comment by umesh katara on February 15, 2015 at 4:03pm

वाह अच्छी गजल


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 15, 2015 at 3:36pm

सदैव की भाति एक अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है, आदरणीय धर्मेन्द्र सिंह जी आपको बधाई अर्पित है.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 15, 2015 at 3:20am

आदरणीय धर्मेन्द्र सिंह जी ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें...

मुझे बह्र में एक फैलुन अधिक लग रहा है इसके स्थान पर फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फ़ा होता तो ग़ज़ल की गेयता ज्यादा बेहतर होती मेरे हिसाब से .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 14, 2015 at 8:54pm

ACHCHHA PRAYAAS HAII BADHAYEE I

Comment by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on February 14, 2015 at 6:11pm

धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी , बहुत सुन्दर .रचना पर हार्दिक बधाई !-जगदीश पंकज

Comment by Hari Prakash Dubey on February 14, 2015 at 8:58am

आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी , इस सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई आपको !

दिल बंजर हो जाएगा आँसू मत रोको

ख़तरनाक है यूँ पानी खारा रुक जाना.....बढ़िया !

 

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