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ग़ज़ल - सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं ( गिरिराज भंडारी )

22   22  22  22   22  2

ये कैसी महफिल में मुझको ले लाया

हर कोई लगता है गुमसुम, थर्राया

 

सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं

गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया

 

साहिल साहिल बात चली है लहरों में

तूफ़ाँ ने जब तोड़ी कश्ती, इतराया                                                                                                                                                               

क्या जज़्बा हाथों से बहते रहता है ?

धोते ही हाथों को पानी गँदलाया

 

दोनों कूदे संग प्रेम की खाई में

प्रश्न कहाँ तब, किसने किसको बहकाया

 

बाग़ों, फूलों, पगडंडी की बातें कर

धुयें उगलती चिमनी से मन उकताया  

 

झूठ बहुत वाचाल मिला जो झूठों में    

सच के आगे वही झूठ था हकलाया

 

धीरे धीरे यादें सब मिट जायेंगी

जैसे वक़्त हुआ तो माजी धुँधलाया 

*********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

 

 

 

 

Views: 977

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 10:07pm

आदरणीय गुमनाम भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका दिली शुक्रिया ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 25, 2015 at 8:28pm

सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं

गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया

साहिल साहिल बात चली है लहरों में

तूफ़ाँ ने जब तोड़ी कश्ती, इतराया

बहुत ही बढ़िया , हार्दिक बधाई सादर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 2:29pm

आदरणीय सौरभ भाई , आपके कमाल ने मेरे अन्दर कमाल का आनन्द भर दिया !! आपका कहना सही है , मै उस मिसरे को वैसे ही सुधार  लूंगा ॥ आभार आपका ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 2:27pm

आदरणीय हरि भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 2:26pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , आपकी सराहना ने मेरा गज़ल कहना सार्थक कर दिया ॥ आपका दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 2:25pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , सराहना और सलाह के लिये आपका हार्दिक आभार । मै कुछ परिवर्तन ज़रूर करूँगा ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 2:23pm

आदरणीय महर्षि भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 25, 2015 at 12:18pm

कमाल ! इससे कमतर कुछ नहीं. सान्द्र सोच शब्द पागयी है, आदरणीय.


सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं
गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया
व्याकरण सम्मत होगा -
सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं
गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाये

उला को यों किया जाय -
हर रस्ता इन शहरों का बातूनी है
तो आपका सानी-मिसरा सधा दिखेगा.  ऐसा मुझे लगता है.
दिल से दाद कुबूल कीजिये, भाईजी.

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 10:45am

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर, शानदार ग़ज़ल है 

ये कैसी महफिल में मुझको ले लाया

हर कोई लगता है गुमसुम, थर्राया....सुन्दर  

सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं

गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया...बहुत ही बढ़िया , हार्दिक बधाई सादर !

Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 1:07am

सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं

गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया

 

साहिल साहिल बात चली है लहरों में

तूफ़ाँ ने जब तोड़ी कश्ती, इतराया                                                                                                                                                               

क्या जज़्बा हाथों से बहते रहता है ?

धोते ही हाथों को पानी गँदलाया

 

दोनों कूदे संग प्रेम की खाई में

प्रश्न कहाँ तब, किसने किसको बहकाया

 

बाग़ों, फूलों, पगडंडी की बातें कर

धुयें उगलती चिमनी से मन उकताया  

आदरणीय गिरिराज सर ,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है |सभी अशआर लासानी हैं |शेरियत और तय्ख्खुल भी पूरे शबाब पर है |बागों ,फूलों पगडण्डी...........वाला शेर दिल को छू गया ,यह मेरे मिज़ाज का शेर है ,आपकी कलम से इस ख्याल को अच्छा निखार मिल गया है |

सादर अभिनन्दन |

 

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