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तेरी मुस्कान तेरी शान तेरा ये जलवा

२१२२  ११२२   १२२२   २२/११२

तेरी मुस्कान तेरी शान तेरा ये जलवा

काजू किशमिश से भरा जैसे बादामी हलवा

तू न होता तो भला कैसे दिल से दिल मिलते

ऐ हंसी गुल किसी जूही से मुझे  भी मिलवा

तेरी खुशबू में छुपा धड़कने दूंगा दिल की

बात जैसे भी बने बात तो मेरी बनवा

फायले दिल में हैं उनके तमामों नाम लिखे

फैसला होने से पहले मेरी अर्जी लगवा

उसके पहलू में जियूं आरजू है इतने सी

उसके सीने में मेरा प्यार जगा दे मितवा

आखरी है ये मेरा फैसला तू भी सुन ले

गर जो उसका न हुआ पहनूं मैं कपडे भगवा 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 4, 2015 at 5:04pm

आदरणीय आशुतोष भाई , अच्छी गज़ल हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥ 

Comment by Pari M Shlok on March 4, 2015 at 1:40pm
उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई
Comment by Pari M Shlok on March 4, 2015 at 1:40pm
उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई
Comment by Shyam Narain Verma on March 4, 2015 at 9:58am
इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 
Comment by umesh katara on March 3, 2015 at 9:19pm

वाह वाह वाह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 3, 2015 at 9:13pm

आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी सुन्दर अशआर हुए है .. हार्दिक बधाई... आदरणीय गुमनाम सर जी की बात पर ध्यान जरुर दीजियेगा.

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 3, 2015 at 8:06pm

आशुतोष जी ग़ज़ल अच्छी कही है पर मुझे काफिये थोडा सा गलत लग रहे है.............

Comment by somesh kumar on March 3, 2015 at 7:38pm

हंसी -दिल्लगी -मिन्नत-ख्वाहिश -पूर्ण समपर्ण के भावों की यात्रा करती गेय और आनन्ददायनी गज़ल 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 3, 2015 at 7:26pm

तू न होता तो भला कैसे दिल से दिल मिलते

ऐ हंसी गुल किसी जूही से मुझे  भी मिलवा

तेरी खुशबू में छुपा धड़कने दूंगा दिल की

बात जैसे भी बने बात तो मेरी बनवा--------------- आदरणीय आशुतोष जी  i मैंने आपकी  गजल् तरन्नुम  में गुनगुनायी  i बहुत मजा आया  i सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on March 3, 2015 at 5:49pm

आखरी है ये मेरा फैसला तू भी सुन ले

गर जो उसका न हुआ पहनूं मैं कपडे भगवा ...वाह , डॉक्टर आशुतोष  जी ,सुन्दर ग़ज़ल बधाई आपको !

कृपया ध्यान दे...

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