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दुनियादारी निभा रहा हूं! (कविता)

आंखों में आंसू हैं, और गीत ख़ुशी के गा रहा हूं!

कुछ नहीं यारों, मैं तो बस दुनियादारी निभा रहा हूं!!

कुछ अपनों ने लूटा हमको,

कुछ गैरों ने सताया..

मौका मिला जिसे भी, उसने

जी-भर हमें रुलाया..

सबपे किया भरोसा, उसकी क़ीमत चुका रहा हूं!

नित सांझ ढले यादों की,

बारात जब आती है..

भर रहे ज़ख्मों को,

फिर से कुरेद जाती है..

मैं दिल के घाव पे तो, मरहम लगा रहा हूं!

उजड़ गया वो गुलशन,

हमने जिसे लहू से सींचा था..

टूटा नेह का धागा, हमने

इतना ज़ोर से खींचा था..

टूटे हुए धागे पे कुछ, गांठें लगा रहा हूं!

आंखों में आंसू हैं, और.............!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on August 19, 2015 at 9:11pm

हार्दिक आभार,आप दोनों सज्जनों का..
:-)


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Comment by मिथिलेश वामनकर on July 29, 2015 at 8:33pm

आदरणीय  Jaynit Kumar Verma जी आपकी किसी पहली रचना से गुजर रहा हूँ. इस संभावनाओं से भरे आश्वस्तकारी प्रयास की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.....

Comment by maharshi tripathi on July 29, 2015 at 6:38pm

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