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यादें मरा नहीं करतीं (कविता)

तुम्हारे जाने के बाद
सोचा था,भुला दूंगा तुम्हें
जी लूँगा,उसी तरह
जैसे जीता था
जब तुम नहीं थे ज़िन्दगी में।
काटता रहा ज़िन्दगी...पल-पल
इसी भ्रम में
जी कहाँ पाया तब से?
काश!पहले पता होता
कमबख्त..यादें मरा नहीं करतीं
दिनभर की आपाधापी के बाद
साँझ ढले लौट आती हैं,घोंसले में
किसी उन्मुक्त पंछी की तरह
बहुत प्रयास किये
तिनका-तिनका नोच फेंकने के बाद भी
उजाड़ न पाया इनका बसेरा
सदा के लिए।
इनके कलरव हरपल
कांटे चुभोते हैं दिल में।
सुनो...!
मैंने अब ये शज़र काटने का
फैसला कर लिया है
माफ़ करना, इसके अलावा
दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं मेरे पास
तेरी यादों से मुक्ति पाने का...।
~
~
-जयनित
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 654

Comment

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Comment by Neeraj Neer on September 4, 2015 at 8:40pm

बहुत सुंदर हृदय को छूती हुई रचना ॥ 

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 3, 2015 at 10:18pm

हार्दिक आभार, आप दोनों का..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 6:10pm

आदरणीय  Jaynit Kumar Verma जी आपकी दूसरी रचना से गुजर रहा हूँ. इस शानदार प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई.....

Comment by kanta roy on September 2, 2015 at 5:47pm
बहुत सुंदर लिखे है आपने कि यादें नहीं मरा करती है । बधाई आपको आदरणीय जयनित जी ।

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