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" फासला " (लघुकथा)
                "कादिर मियाँ आप होश में तो है शेख सादी को रिहा करवाना चाहते है, वतन की अमन परस्ती का भी ख्याल करो।" वसीम साहब कुछ तेज आवाज में हैरानी से बोले। जबाब में कादिर मियाँ का लहजा भी उखड़ गया। "वसीम साहब। 'शेख' के रिहा होने से हमारा कारोबारी फायदा होगा, उसकी नजरबंदी से हम पहले ही बहुत नुक्सान उठा चुके है। रही बात हालात की तो उस पर नजर रखना आपकी हुकूमत का काम है।"
                 "ठीक है कादिर मियाँ मगर दहशतगर्दी का क्या जो फिर से..........।" वसीम साहब की बात कादिर मियाँ ने बीच में ही काट दी। "इस छोटी मोटी दहशतगर्दी को छोड़िये, बाहर से होने वाली दहशतगर्दी से बचाइये अपने वतन को।" वसीम साहब पर गहरी नजर डालते हुये कादिर ने अपनी बात पूरी की। "और इसके लिये जरूरी है आपकी सीट का कायम रहना और यकीं रखिये हम आप के साथ है, गर आप चाहेगें तो।"

                 वसीम साहब घर में पैदा हो रहे इस दहशतगर्द का और बाहरी दहशतगर्द का फासला ही तय करते रह गये और कादिर मियाँ खुदा हाफिज करके जा चुके थे।


(मौलिक एवम अप्रकाशित)
'विरेन्दर वीर मेहता'

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Comment by rajesh kumari on March 10, 2015 at 8:37pm

बहुत खूब सामयिक व्यंगात्मक लघु कथा.हार्दिक बधाई आपको जय हिन्द  

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 10, 2015 at 8:08pm
कारोबार बड़ी चीज़ है, बाकी तो सब होता रहता है। बहुत सुन्दर कथा , बधाई , आदरणीय वीरेंदर मेहता जी। सादर।
Comment by Shyam Mathpal on March 10, 2015 at 7:49pm

Aadarniya Vitender Veer Mehta JI,

Aajkal kuch ese hi halat desh main hain. Samayik laghu katha ke liye badhai.

Comment by maharshi tripathi on March 10, 2015 at 6:52pm

आपकी लघुकथा देश प्रेम को बढ़ावा देती है ,,हार्दिक बधाई आ.वीरेंदर वीर जी |

Comment by Hari Prakash Dubey on March 10, 2015 at 6:47pm

आदरणीय विरेन्दर वीर मेहता जी , सुन्दर रचना , वर्तमान परिपेक्ष्य में  सटीक बैठती है , हार्दिक बधाई ,खुदा हाफिज:-)))))

Comment by विनय कुमार on March 10, 2015 at 6:26pm

बड़ी ही मौजूं और सटीक रचना | अपने राजीनीतिक फायदे के लिए मुल्क की भी भेंट चढ़ा सकते हैं ये लोग | बहुत बहुत बधाई इस रचना की लिए..

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