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रुख़सती पे उनकी...............

रुख़सती पे उनकी आँखों में नमी अच्छी लगी

ज्यूं दूर बादलों को धरा की गमी अच्छी लगी

तबस्सुम देख के मचली लबों पे एक दूसरे के

पाक इरादों में छिपी उनकी कमी अच्छी लगी

असीम समन्दर की रगों में खारापन भी देखिए

फिर भी मिलने आ गई मीठी नदी अच्छी लगी

अपनी मिल्कियत समझता रहा जहाँ को दोस्तों

चलते हुए उनको भी दो गज जमीं अच्छी लगी

@आनंद १४/०३/२०१५ मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 16, 2015 at 9:39pm

आ० गिरिराज जी एवं डॉ गोपाल जी की बात का समर्थन करती हूँ ये प्रस्तुति भाव प्रधान हैं ग़ज़ल की कसौटी पर कसोगे तो बेहतरीन ग़ज़ल बन सकती है ,प्रयास कीजिये सफलता मिलेगी बहरहाल इस प्रयास पर हार्दिक बधाई. 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:25pm

आनंद जी

आ० भंडारी जी के मंतव्य पर ध्यान दे . आपकी गजल का भाव पक्ष अच्छा है .तनिक प्रयास से आप अच्छे शुद्ध गजल लिख  सकते हैं .सस्नेह .

Comment by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 3:38pm

Priya Anad Murti ji,

Sundar rachna ke liye badhai.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 16, 2015 at 12:59pm

आ. आनन्द भाई , रचना के भाव बहुत सुन्दर लगे ! गज़ल के करीब  ज़रूर है रचना पर गज़ल नहीं हो पाई है । अगर आप गज़ल कहना चाह रहे हैं तो  मंच मे उपलब्ध ' ग़ज़ल की बातें ' पाठ का अध्ययन ज़रूर करें ॥

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 3:44am

श्री आनंद मूर्ति जी ,सुन्दर प्रयास ,सुन्दर ग़ज़ल हार्दिक बधाई आपको !

Comment by maharshi tripathi on March 15, 2015 at 9:37pm

असीम समन्दर की रगों में खारापन भी देखिए

फिर भी मिलने आ गई मीठी नदी अच्छी लगी...........वाह !!! बहुत खूब आ.भाईanand murthy  जी |

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 15, 2015 at 2:57pm
अच्छा लिखा है भाई जी बधाई

कृपया ध्यान दे...

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