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ग़ज़ल -- हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है। ( बराए इस्लाह )

1222-1222-122

सफ़र सच का अगर लम्बा बहुत है
मुझे भी हौसला थोड़ा बहुत है

सभी के सामने जो मुस्कुराता
वही छुप छुप के क्यूँ रोता बहुत है

पड़ी है ईद दीवाली इकठ्ठा
नगर में आज़ सन्नाटा बहुत है

गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा
बहाना जो भी हो थोथा बहुत है

कमा कर भेजता वो माँ को पैसे
मगर इक माँ को क्या इतना बहुत है

भँवर में जो फँसा हो उससे पूछो
सहारे के लिए तिनका बहुत है

चले ही जाना सबको इस जहाँ से
हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है

बिसाते वक़्त पर सपनों की बाज़ी
हमारी हार का खतरा बहुत है

ग़ज़ल अब भी मुकम्मल कह न पाया
अगरचे ज़ेहन ने सोचा बहुत है

--------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित) © दिनेश कुमार
------------------------------

Views: 615

Comment

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Comment by Nirmal Nadeem on March 21, 2015 at 2:59pm
बहुत उम्दा वाह वाह वाह
बहुत खूब
मुबारक हो
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 21, 2015 at 9:42am
सुन्दर , बधाई , सादर।
Comment by umesh katara on March 21, 2015 at 9:03am

वाहहहहह जनाब वाहहहहहहह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 20, 2015 at 9:18pm

आदरणीय दिनेश भाई जी बहुत बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद हाज़िर है 

ये अशआर बहुत भाए-

गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा
बहाना जो भी हो थोथा बहुत है

भँवर में जो फँसा हो उससे पूछो
सहारे के लिए तिनका बहुत है

ग़ज़ल अब भी मुकम्मल कह न पाया
अगरचे ज़ेहन ने सोचा बहुत है

Comment by maharshi tripathi on March 20, 2015 at 6:22pm

भँवर में जो फँसा हो उससे पूछो
सहारे के लिए तिनका बहुत है,,,,,,,वाह !! सुन्दर रचना पर ,,बधाई आपको आ. दिनेश कुमार जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 20, 2015 at 5:31pm

आ० दिनेश जी

बहुत बढिया

.ग़ज़ल अब भी मुकम्मल कह न पाया
अगरचे ज़ेहन ने सोचा बहुत है

कृपया ध्यान दे...

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