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दफन है बहुत आग सीने में जिसके ------ग़ज़ल उमेश कटारा

122 122 122 122

बहुत हो चुकी हैं शराफत की बातें
चलो अब करें कुछ व़गाव़त की बातें
....
हसद है उन्हें अब मेरी शौहरतों से
जो करते कभी थे रियाज़त की बातें
.....
दफन है बहुत आग सीने में जिसके
वो कैसे   करेगा नज़ाकत की बातें
.....
बुजुर्गों की सेवा जरूरी बहुत है
करो सिर्फ इनकी इवादत की बातें
......
मुआफी के काबिल नहीं बेवफाई
न मुझसे करो तुम नदामत की बातें
......
जिसे जिन्दगी देके मैंने बचाया
वो करने लगा है खिलाफत की बातें

रियाजत --समर्पण
हसद-जलन
नदामत--पश्चाताप
अदावत -दुश्मनी

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 697

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Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 10:05pm

आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी सादर आभार

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 10:05pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी सादर आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 1:05pm

बहुत खूब , आदरणीय कटारा भाई जी , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:48pm

जिसे जिन्दगी देके मैंने बचाया
वो करने लगा है खिलाफत की बातें

बहुत खूब आ०उमेश जी!बधाईयां!

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 9:00am

आदरणीय मिथिलेश वामनकरजी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 9:00am

आदरणीय Mohan Sethi 'इंतज़ार' जी शुक्रिया

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 2, 2015 at 5:42am

आदरणीय बढ़िया ग़ज़ल हुई है बधाई

दफन है बहुत आग सीने में जिसके
वो कैसे   करेगा नज़ाकत की बातें

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 1, 2015 at 11:46pm

आदरणीय उमेश जी सुन्दर ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई.

Comment by umesh katara on April 1, 2015 at 9:52pm

आदरणीय pratibha tripathi जी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 1, 2015 at 9:52pm

आदरणीय vandana जी शुक्रिया

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