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" हम " का बार बार बिखरना

चैन से रहते थे कभी
तीन कमरों की छत के साये में 
मैं ,मेरे माँ-बाबूजी
मेरी पत्नि 
मेरे बच्चे शामिल थे
एक 'हम ' शब्द में ।


धीरे धीँरे 
'हम ' शब्द बिखर गया
मा-बाबूजी बाहर वाले 
कमरे में भेज दिये गयेे
अब वो दोनों हो गये थे
' हम ' और माँ-बाबूजी 
अब हम ' का विस्तार 
मैं,मेरी पत्नि,मेरे बच्चों
तक सिमट गया था
माँ -बाबूजी 'और' हो चुके थे ।।


मेरा बेटा भी अब
बाल बच्चेदार हो गया हैे
'हम ' शब्द  आतुर है
एक बार फिरसे टूटने बिखरने 
मैं -मेरी पत्नि
' और '  होने वाले हैं 
मेरे बेटे के परिवार के लिये
मुझे अफसोस नहीं मेरे 
और हो जाने का 
अफसोस है
बाहर वाले कमरे को
कैसे खाली कराऊँ 
माँ-बाबूजी से ।।।

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा





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Comment by umesh katara on April 4, 2015 at 2:09pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra जी आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 4, 2015 at 1:48pm

आदरणीय मन को झकझोर देने वाली शानदार रचना ..मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by umesh katara on April 3, 2015 at 7:43pm

आदरणीय Mohan Sethi 'इंतज़ार' जी सादर आभार

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 3, 2015 at 4:08pm

आदरणीय क्या ख़ूब लिखा है ..सच में दिल तक लगती है ....प्रस्तुति के लिये बधाई ...सादर 

Comment by umesh katara on April 3, 2015 at 8:56am

आदरणीय ajay sharma जी सादर आभार

Comment by ajay sharma on April 2, 2015 at 10:55pm

wah wah kya baat hai .....bahut ki umda 

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 10:03pm

आदरणीय Shyam Mathpal जी सादर आभार

Comment by Shyam Mathpal on April 2, 2015 at 8:02pm

आदरणीय उमेश कटारा जी ,

कई घरों व दिलों की कहानी. 

हार्दिक बधाई.

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 7:21pm

आदरणीय  मिथिलेश वामनकरजी सादर आभार

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 7:21pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी सादर आभार

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