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गजल --तू मुस्करा के देख ले दिल से लगा के देख ले

2212  2212
तू मुस्करा के देख ले
दिल से लगा के देख ले

झुकना नहीं मंजूर अब
कोई झुका के देख ले

है नाम तेरे जिन्दगी
बस आजमा के देख ले

ये खेल है दिलकस बहुत
बाजी लगा के देख ले

बुझते मुहब्बत के चिराग
अब तो जला के देख ले

कोई नहीं हमसा यहाँ 
नजरें घुमा के देख ले

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 774

Comment

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Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 9:33pm

आदरणीयNilesh Shevgaonkar जी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 9:32pm

आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuriजी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 9:32pm

आदरणीयNazeel जी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 9:32pm

आदरणीय Hari Prakash Dubeyजी शुक्रिया

Comment by Hari Prakash Dubey on April 5, 2015 at 8:53pm

आ.उमेश कटाराजी इस सुन्दर ग़ज़ल पर बहुत-बहुत बधाई आपको !

/ये खेल है दिलकस बहुत
बाजी लगा के देख ले/
/बुझते मुहब्बत के चिराग
अब तो जला के देख ले/

/कोई नहीं हमसा यहाँ 
नजरें घुमा के देख ले/.......वाह !

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 5, 2015 at 5:16pm

क्या बात है! क्या बात है!

बड़े दिल से ख़ूब रंग में लिखी है! बधाईयां!

Comment by Nazeel on April 5, 2015 at 4:53pm

आदरणीय   उमेश भाई जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक  बधाई सवीकार करे । 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2015 at 10:56am

बहुत खूब ..वाह वाह 

Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 8:08am

आदरणीय मिथिलेश वामनकरजी शुक्रिया

Comment by umesh katara on April 5, 2015 at 8:07am

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी शुक्रिया

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