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चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे..................

चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे ................

जब छा जाएँगे रिश्तों के निपट अंधेरे

और थकन की धूल पाँव से सर तक बोलेगी

थकते थकते जब इक दिन चुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे................

जब जब बोले हैं , बोले हैं खामोशी से हम

और प्रति-उत्तर भी पाए हैं , वैसे ही हमने

मिलते मिलते मौन कहीं जब थक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे................

सीधी सरल बात भी गीत , ग़ज़ल या छन्द लगे जब

और लगे ये भाव कि जैसे कोई ख़ुश्बू हो आसपास

छलते -पलते जीवन में जब ऐसे तुक आएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे................

प्यास बुझाते रहे मगर हम , सागर से

और मिटाते रहे भीड़ से अपनी तन्हाई

बढ़ते -चढ़ते खुद से जब हम इक दिन झुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे ................

मौलिक अप्रकाशित अजय कुमार शर्मा

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Comment

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Comment by Shyam Mathpal on April 2, 2015 at 8:14pm

आदरणीय अजय शर्मा जी,

सुंदर भाव .बधाई.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 4:31pm

आदरनीय! अजय कुमार शर्मा सर! आप जब भी अपनी रचनाओ के साथ आते है,कमाल आते है,हर बार नयापन होता है,और लाजव़ाब कहन होता है,काश समय मुझे भी आप सा धैर्य सिखा दे!! इस रचना पर तहेदिल से बहुत बहुत बधाई!

Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 3:15pm

बहुत- 2 बढि़या... बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 2:16pm

आदरणीय अजय भाई , भाव पूर्ण , सुन्दर गीत रचना के लिये आपको बधाई ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 2, 2015 at 12:10pm

आ० अजय  शर्मा जी

भाव की दृष्टि से अच्छी रचना है .  सादर.

Comment by somesh kumar on April 2, 2015 at 11:31am

आपके गीतो मे भावुकता और शैली में कुमार विश्वास और विष्णु सक्सेना जी वाला प्रभाव नजर आता है |वस्तुतः आपकी रचनाएँ मंचीय कविताओं वाली अनुभूति कराती हैं |अगर आपने कहीं video अपलोड किया है तो लिंक दें |

Comment by Shyam Narain Verma on April 2, 2015 at 10:37am
बहुत सुन्दर मनभावन गीत .. बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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