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जमाना और था जब प्यार आँसू पोंछ देता था - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222    1222     1222 1222
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ये कैसी  हलचलें  नवयुग  बता  तेरी  रवानी में
बचे  भूगोल  में  नाले  नदी   किस्से  कहानी में
****
बनीं नित नीतियाँ ऐसी हुकूमत हो किसी की भी
नफा व्यापार  में  बढ़चढ़  रहे  फाका किसानी में
****
दिलों का जोश ठंडा है, उमर कमसिन उतरते ही
बुढ़ापा  हो गया हावी  सभी  पर  धुर  जवानी में
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जमाना  और  था  जब  प्यार  आँसू पोंछ  देता था
मगर अब अश्क मिलते हैं मुहब्बत की निशानी में
****
कमी कंकड़ में  है  या  फिर  हमारा हाथ कच्चा है
लहर उठती नहीं जो अब कभी इस झील पानी में
****
सुना था  तुम  हुए मुंसिफ  उजालों  के  नगर  में अब
‘मुसाफिर’ आगये फिर क्यों तमस की हित बयानी में
****
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 2, 2015 at 3:26pm

आदरणीय लक्षमण धामी जी बहुत बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है. आज का एक पुरजोर बयान  है आपकी ग़ज़ल. दिल से दाद कुबूल फरमाए.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:52pm

सुना था  तुम  हुए मुंसिफ  उजालों  के  नगर  में अब
‘मुसाफिर’ आगये फिर क्यों तमस की हित बयानी में

क्या बात है!बधाईयां आदरणीय!

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