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चकोर सवैया

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भगण X 7 + गुरु + लघु
================

फॊरत है मटकी नित मॊहन, नंद यशॊमति तॆ कहु आज !!
चीर चुरावत गॊपिन कॆ सुनु, वॊहि न आवत एकहु लाज !!
नाँवु धरैं नर नारि सबै नित, नाँवु धरै यदु वंश समाज !!
खीझत खीझत ‘राज’कहैं अलि,खूब सताइ रहा बृजराज !!

"राज बुन्दॆली"

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 903

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on April 5, 2015 at 9:03pm

सुन्दर रचना , बधाई और आभार आपका अलग अलग विधाओं से परिचय करवाने के लिए आ. राज बुन्दॆली जी ! सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 5, 2015 at 6:14pm

क्या बात है..बेहद उम्दा!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 5, 2015 at 1:00am

सुन्दर छंद 

Comment by Neeraj Neer on April 4, 2015 at 6:13pm

बहुत सुंदर .... 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 4, 2015 at 5:57pm

आ० बुन्देली जी

बहुत नपी तुली सवैया है ------बस तृतीय पंक्ति का आशय भटका रहा है . सुन्दर प्रयास . सादर .

Comment by Nirmal Nadeem on April 4, 2015 at 11:29am

kya baat hai waah waaah waaah waaaaah ,,,,, bahut khoob

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